Wednesday, July 31, 2013

अंतत:


सुकेश साहनी

‘‘आज दफ्तर नहीं जाना हैं क्या?’’
‘‘तुम्हें दफ्तर की पड़ी है...’’ श्यामलाल झुँझलाकर पत्नी से बोले, ‘‘दो महीने बाद जब मैं रिटायर कर दिया जाऊँगा, तब तुम्हें आटे–दाल का भाव मालूम पड़ेगा। आज मैं ऑफिस न जाकर सेवा–मुक्ति के विरुद्ध अपने प्रत्यावेदन को अंतिम रूप दूँगा...’’
‘‘क्यों नाहक अपना खून जलाते हो,..’’ पत्नी ने कहा, ‘‘अकेले तुम्हीं तो रिटायर होने नहीं जा रहे।’’
‘‘जब तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है तो क्यों हर मामले में अपनी टाँग अड़ाती हो?’’ श्यामलाल ने कुढ़कर जलती हुई आँखों से पत्नी को घूरा, ‘‘सारे कायदे–कानून हमारे लिए ही तो बने हैं। अवतार सिंह को ही ले लो, उसने शासन में अपनी ऐसी गोट फिट कर रखी है कि साठ साल की सेवा के बाद एक–एक साल के दो एक्सटेंशन ले चुका है। इन राजनीतिज्ञों को देख लो...इनके सेवा काल में उम्र कहीं आड़े नहीं आती। तुम्हें मेरी क्षमता का अभी कोई अंदाजा नहीं है, मैं आज भी तीन–चार आदमियों का काम अकेले कर सकता हूं। आजकल के एम.ए. पास छोकरे मेरे आगे पानी भरते हैं – श्यामलाल जी यह बता दीजिए, यह एप्लीकेशन जाँच दीजिए...इस पत्र का जवाब बनवा दीजिए...। और मुझे ही रिटायर किया जा रहा है। मैं कल हर हालत में निदेशक को अपना प्रत्यावेदन भेज दूँगा।’’ थोड़ा रुककर बोले, ‘‘अच्छा–खासा लिखने का मूड था, तुमने चौपट करके रख दिया। थैला लाओ,.....पहले बाज़ार से सामान ले आता हूँ।’’
इस बार पत्नी कुछ नहीं बोली। उसने चुपचाप थैला उन्हें थमा दिया। रोज़गार कार्यालय के सामने से लौटते हुए श्यामलाल ठिठक गए। उन्होंने हैरानी से देखा...परेशान–से इधर–उधर घूमते पच्चीस–तीस वर्षीय बूढ़े युवक–युवतियाँ....चश्मों के मोटे–मोटे शीशों के पीछे सोचती हुई उदास आँखें...न जाने कितनी चलती–फिरती लाशें। उन बेरोज़गार युवक–युवतियों की भीड़ को एकटक देखते हुए श्यामलाल गहरी सोच में डूब गए।
सीटी की आवाज़ से श्यामलाल की पत्नी चौंक पड़ी। इस तरह की सीटी जवानी के दिनों में श्यामलाल बजाया करते थे। उसे लगा तीस साल पहले वाले जवान श्यामलाल ने घर में प्रवेश किया है। उन्होंने सामान का थैला पत्नी को दिया और मुस्कराकर बोले, ‘‘एक प्याला गर्म–गर्म चाय तो पिलाओ’’ -कहकर वह आरामकुर्सी पर पसर गए। अगले ही क्षण वह अपने विदाई समारोह की कल्पनाओं में खो गए थे।
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Saturday, August 14, 2010

अथ उलूक कथा

सुकेश साहनी

शिकार की ताक में घंटों एक टांग पर खड़े रहने के बावजूद जब उसके हाथ कुछ नहीं लगा, तो वह किसी दूसरे सरोवर की तलाश में निकल पड़ा।

रास्ते में हर कहीं खुशहाली थी। सब अपने–अपने काम में इस कदर मग्न थे कि किसी ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा तक नहीं। यह देखकर वह गहरी चिंता में डूब गया।

एक पेड़ के नीचे से गुजरते हुए उसे दो उल्लू झगड़ते हुए दिखाई दिए।

‘‘इस इमारत का मालिक मैं हूँ !’’ पहला उल्लू।

‘‘क्या बकते हो?’’ दूसरा उल्लू, ‘‘इसे तो हमारे पूर्वजों ने बनवाया था।’’

‘‘तुम्हारे पूर्वज कितने बड़े लुटेरे थे, यह सभी जानते हैं।’’ पहले ने तीर छोड़ा।

‘‘जबान संभाल कर बात करो, नहीं तो.....’’ दूसरा गुर्राया।

दोनों झगड़ने लगे।

उसने दोनों को शांत कराया और फिर बड़ी गंभीरता से क्षेत्र का निरीक्षण करने लगा। दूर–दूर तक किसी इमारत का नामोनिशान तक न था। वैसे भी, वह यह सोचकर दंग था कि उल्लू दिन में कब से देखने लगे।

वह उल्लुओं को समझाते हुए बोला, ‘‘आप दोनों की तीव्र दृष्टि एवं कुशाग्र बुद्धि काबिले -तारीफ है। अपनी–अपनी जगह आप दोनों ही सही हैं। इमारत किसकी है, इसका फैसला आम सहमति से जल्दी ही हम कर देंगे।’’ कहकर उसने दोनों को पहचान के लिए अलग–अलग रंग की टोपियाँ पहना दी।

उल्लू बिरादरी में यह खबर आग की तरह फैल गई। दिनभर उसके पास उल्लुओं का जमघट लगा रहने लगा। अब वह बाकायदा कुर्सी पर बैठकर उनको टोपियाँ पहनाने लगा।

अगली बार वह जब क्षेत्रीय भ्रमण पर निकला, तो हर शाख पर टोपीवाले उल्लू बैठे थे और उस अदृश्य इमारत को लेकर आपस में झगड़ रहे थे।

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Friday, July 9, 2010

वायरस

सुकेश साहनी

आँगन में ट्राइसिकिल चलाते हुए बच्चा ऊँची आवाज में गा रहा था, ‘‘जुम्मे के जुम्मे घर आया करो, हम तुम्हारे दिल में रहते हैं.....आकर चुम्मा दे जाया करो....


साइकिल के पीछे तालियां पीटते हुए दौड़ रही उसकी बहन भी बोले जा रही थी, ‘‘जुम्मा–जुम्मा.....चुम्मा–चुम्मा!’’

ये सुनकर रसोई में काम कर रही बच्चों की माँ का खून खौल उठा, वह अपना आपा खो बैठी, दनदनाते हुए बाहर आई और चिमटे से दोनों बच्चों को ताबड़तोड़ पीटने लगी।

इस अप्रत्याशित मार से बौखलाकर बच्चे ‘पापा...पापा’ चिल्लाने लगे, अगले ही क्षण फूट–फूटकर रोने लगे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें किस बात की सजा दी जा रही है।

चीख–पुकार सुन बाथरूम से दौड़े आए बच्चों के पिता ने बीच–बचाव करते हुए पत्नी को झिड़का, ‘‘पागल हुई हो क्या? ऐसे मारता है कोई बच्चों को! आखिर हुआ क्या है?’’

‘‘हुआ क्या है? हा से निकलते जा रहे हैं दोनों! अभी सुना नहीं...कैसे गंदे–गंदे गाने गा रहे थे....मेरी तो नाक ही कट जाती है सबके सामने!....इन्हें मारते हुए मेरा दिल नहीं दुखता क्या!!’’ कहते हुए पत्नी सिसकने लगी।

पति–पत्नी ने इस मसले पर गंभीरता से विचार किया, कुछ नियम–कानून बनाए गए और उन पर उसी दिन से सख्ती से अमल किया जाने लगा। सबसे पहले टी.वी. का केबिल कनेक्शन कटवा दिया गया। दूरदर्शन के शिक्षाप्रद कार्यक्रम ही बच्चों को देखने दिए जाते, यहां भी कार्यक्रम के बीच–बीच दिखाए जाने वाले विज्ञापन समस्या बने रहते, जिनसे रिमोट कंट्रोल के माध्यम से निबटा जाता। जब किसी फिल्म की बहुत तारीफ सुनी जाती,बच्चे देखने की जिद करने लगते तो वे दोनों सिनेमा हाल जाकर पहले खुद फिल्म देखते और साफ–सुथरी होने पर ही बच्चों को दिखाने ले जाते। किसी समारोह के अवसर पर बजने वाले गानों को लेकर पड़ोसियों से भी अक्सर उनकी झाँय–झाँय हो जाती थी। कुल मिलाकर बच्चों के हित में जितनी तरह की नाकेबंदी वे कर सकते , कर रहे थे। उन्हें लगने लगा था कि इस कड़ाई से बच्चे पूरी तरह सुधर गए हैं।

छुट्टी का दिन था, बच्चे होमवर्क कर रहे थे, पति अखबार पढ़ रहा था और पत्नी कहीं बैठी सब्जी काट रही थी।

तभी अप्रत्याशित बात हुई....

पत्नी की समझ में नहीं आया कि पति और बच्चे आँखें फाड़े उसे क्यों देखे जा रहे हैं...असंभव!....ऐसा कैसे हो सकता है? उसने खुद को चुटकी काटकर देखा...सच्चाई उसे मुँह चिढ़ा रही थी....उसने चाहा धरती फटे और वह उसमें समा जाए।

....दरअसल सब्जी काटते हुए न जाने कब....कैसे वह गुनगुनाने लगी थी, ‘‘लड़का कमाल का अँखियों से गोली मारे !.....’’

Wednesday, July 7, 2010

चादर


सुकेश साहनी

दूसरे नगरों की तरह हमारे यहाँ भी खास तरह की चादरें लोगों में मुफ्त बाँटी जा रही थीं, जिन्हें ओढ़कर टोलियाँ पवित्र नगर को कूच कर रही थीं। इस तरह की चादर ओढ़ने–ओढ़ाने से मुझे सख्त चिढ़ थी, पर मुफ्त चादर को मैंने यह सोचकर रख लिया था कि इसका कपड़ा कभी किसी काम आएगा। उस दिन काम से लौटने पर मैंने देखा सुबह धोकर डाली चादर अभी सूखी नहीं थी। काम चलाने के लिए मैंने वही मुफ्त में मिली चादर ओढ़ ली थी। लेटते ही गहरी नींद ने मुझे दबोच लिया था।

आँख खुली तो मैंने खुद को पवित्र नगर में पाया। यहाँ इतनी भीड़ थी कि आदमी पर आदमी चढ़ा जा रहा था। हरेक ने मेरी जैसी चादर ओढ़ रखी थी। उनके चेहरे तमतमा रहे थे। हवा में अपनी पताकाएँ फहराते जुलूस की शक्ल में वे तेजी से एक ओर बढ़े जा रहे थे। थोड़ी–थोड़ी देर बाद ‘पवित्र पर्वत’ के सम्मिलित उद्घोष से वातावरण गूँज उठा था। विचित्र–सा नशा मुझ पर छाया हुआ था। न जाने किस शक्ति के पराभूत मैं भी उस यात्रा में शामिल था।

इस तरह चलते हुए कई दिन बीत गए पर हम कहीं नहीं पहुँचे। दरअसल हम वहाँ स्थित पवित्र पर्वत के चक्कर ही काट रहे थे।

‘‘हम कहाँ जा रहे हैं?’’ आखिर मैंने अपने आगे चल रहे व्यक्ति से पूछ लिया। ‘‘वह पवित्र पर्वत ही हमारी मंजिल है।’’ उसने पर्वत की चोटी की ओर संकेत करते हुए कहा।

‘‘हम वहाँ कब पहुँचेगे?’’

‘‘क्या बिना पवित्र चढ़ाई चढ़े उस ऊँचाई पर पहुँचना सम्भव होगा?’’ मैंने शंका जाहिर की।

इस पर वह बारगी सकपका गया, फिर मूँछें ऐंठते हुए सन्देह भरी नजरों से मुझे घूरने लगा।

तभी मेरी नजर उसकी चादर पर पड़ी। उस पर खून के दाग थे। मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। मैंने दूसरी चारों पर गौर किया तो सन्न रह गया, कुछ खून से लाल हो गई थीं और कुछ तो खून से तरबतर थीं। सभी लोग हट्टे–कट्टे थे, किसी को चोट चपेट भी नहीं लगी थी और न ही वहां कोई खून–खराबा हुआ था, फिर उनकी चादरों पर ये खून....? देखने की बात ये थी कि जिसकी चादर जितनी ज्यादा खून से सनी हुई थी, वो इसके प्रति उतना ही बेपरवाह हो मूँछें ऐंठ रहा था। यह देखकर मुझे झटका–सा लगा और मैं पवित्र नगर से निकल पड़ा।

लौटते हुए मैंने देखा, पूरा देश दंगों की चपेट में था, लोगों को जिन्दा जलाया जा रहा था, हर कहीं खून–खराबा था। मैंने पहली बार अपनी चादर को ध्यान से देखा, उस पर भी खून के छींटे साफ दिखाई देने लगे थे। मैं सब कुछ समझ गया। मैंने क्षण उस खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंका।

Sunday, June 27, 2010

कसौटी


सुकेश साहनी

खुशी के मारे उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। साइबर कैफे से बाहर आते ही उसने घर का नम्बर मिलाया।

‘‘पापा!...’’ उससे बोला नहीं गया।

‘‘हमारी बेटी ने किला फतेह कर लिया! है न?’’

‘‘हाँ, पापा!’’ वह चहकी, ‘‘मैंने मुख्य परीक्षा पास कर ली है। मेरिट में दूसरे नम्बर पर हूँ !’’

‘‘शाबाश! मुझे पता था... हमारी बेटी है ही लाखों में एक!’’

‘‘पापा, पंद्रह मिनट के ब्रेक के बाद एक माइनर पर्सनॉलिटी टेस्ट और होना है। उसके फौरन बाद हमें अपाइंटमेंट लेटर दे दिए जाएँगे। मम्मी को फोन देना...’’

‘‘इस टेस्ट में भी हमारी बेटी अव्वल रहेगी। तुम्हारी मम्मी सब्जी लेने गई है। आते ही बात कराता हूँ। आल द बेस्ट, बेटा!’’

उसकी आँखें भर आईं। पापा की छोटी-सी नौकरी थी, लेकिन उन्होंने बैंक से कर्जा लेकर अपनी दोनों बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी। मम्मी-पापा की आँखों में तैरते सपनों को हकीकत में बदलने का अवसर आ गया था। बहुराष्ट्रीय कम्पनी में एग्ज़ीक्यूटिव ऑफिसर के लिए उसने आवेदन किया था। आज ऑनलाइन परीक्षा उसने मेरिट में पोजीशन के साथ पास कर ली थी।

दूसरे टेस्ट का समय हो रहा था। उसने कैफे में प्रवेश किया। कम्प्यूटर में रजिस्ट्रेशन नम्बर फीड करते ही जो पेज खुला, उसमें सबसे ऊपर नीले रंग में लिखा था-‘‘वेलकम-मिस सुनन्दा!’’ नीचे प्रश्न दिए हुए थे, जिनके आगे अंकित ‘यस’ अथवा ‘नो’ को उसे ‘टिक’ करना था...

विवाहित हैं? इससे पहले कहीं नौकरी की है? बॉस के साथ एक सप्ताह से अधिक घर से बाहर रही हैं? बॉस के मित्रों को ‘ड्रिंक’ सर्व किया है? एक से अधिक मेल फ्रेंड्स के साथ डेटिंग पर गई हैं? किसी सीनियर फ्रेंड के साथ अपना बैडरूम शेअर किया है? पब्लिक प्लेस में अपने फ्रेंड को ‘किस’ किया है? नेट सर्फिेग करती हैं? पॉर्न साइट्स देखती हैं? चैटिंग करती हैं? एडल्ट हॉट रूम्स में जाती हैं? साइबर फ्रेंड्स के साथ अपनी सीक्रेट फाइल्स शेअर करती हैं? चैटिंग के दौरान किसी फ्रेंड के कहने पर खुद को वेब कैमरे के सामने एक्सपोज़ किया है?.....

सवालों के जवाब देते हुए उसके कान गर्म हो गए और चेहरा तमतमाने लगा। कैसे ऊटपटांग और वाहियात सवाल पूछ रहे हैं? अगले ही क्षण उसने खुद को समझाया-बहुराष्ट्रीय कम्पनी है, विश्व के सभी देशों की सभ्यता एवं संस्कृति को ध्यान में रखकर क्वेश्चन फ्रेम किए गए होंगे।

सभी प्रश्नों के जवाब ‘टिक’ कर उसने पेज को रिजल्ट के लिए ‘सबमिट’ कर दिया। कुछ ही क्षणों बाद स्क्रीन पर रिजल्ट देखकर उसके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। सारी खुशी काफूर हो गई। ऐसा कैसे हो सकता है? पिछले पेज पर जाकर उसने सभी जवाब चेक किए, फिर ‘सबमिट’ किया। स्क्रीन पर लाल रंग में चमक रहे बड़े-बड़े शब्द उसे मुँह चिढ़ा रहे थे- ‘सॉरी सुनन्दा! यू हैव नॉट क्वालिफाइड। यू आर नाइंटी फाइव परसेंट प्युअर (pure)। वी रिक्वाअर एट लीस्ट फोर्टी परसेंट नॉटी (naughty)।’

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Friday, April 9, 2010

गोल्डन बैल्ट-

ख़लील ज़िब्रान

अनुवाद : सुकेश साहनी

सालामिस शहर की ओर जाते हुए दो आदमियों का साथ हो गया। दोपहर तक वे एक नदी तक आ गए, जिस पर कोई पुल नहीं था। अब उनके पास दो विकल्प थे–तैरकर नदी पार कर लें या कोई दूसरी सड़क तलाश करें।

‘‘तैरकर ही पार चलते हैं,’’ वे एक दूसरे से बोले, ‘‘नदी का पाट कोई बहुत चौड़ा तो नहीं है।’’

उनमें से एक आदमी, जो अच्छा तैराक था, बीच धारा में खुद पर नियंत्रण खो बैठा और तेज बहाव की ओर खिंचने लगा। दूसरा आदमी, जिसे तैरने का अभ्यास नहीं था,आराम से तैरता हुआ दूसरे किनारे पर पहुंच गया । वहाँ पहुँचकर उसने अपने साथी को बचाव के लिए हाथ पैर मारते हुए देखा तो फिर नदी में कूद पड़ा और उसे भी सुरक्षित किनारे तक ले आया।

‘‘तुम तो कहते थे कि तुम्हें तैरने का अभ्यास नहीं है, फिर तुम इतनी आसानी से नदी कैसे पार गए?’ पहले व्यक्ति ने पूछा।

‘‘दोस्त,’’ दूसरा आदमी बोला, ‘‘मेरी कमर पर बंधी यह बैल्ट देखते हो, यह सोने के सिक्कों से भरी हुई है, जिसे मैंने साल भर मेहनत कर अपनी पत्नी और बच्चों के लिए कमाया है। इसी कारण मैं आसानी से नदी पार कर गया। तैरते समय मैं अपने पत्नी और बच्चों को अपने कन्धे पर महसूस कर रहा था।’’

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तूलिका

-सुकेश साहनी

अनुवाद-डॉ आत्म देव मिश्र

ॠतु: हेमन्त: ।सायंकालस्य वेला ।शैत्यं संवर्धनयन् शीत: वायु: प्रवहति स्म ।सर्वे जना: तूलिकया आवृता: आसन् ।पक्षिण: अपि स्वकीयेषु निर्मितेषु नीडेषु सुखेन वसन्ति स्म। अस्मिन् शीते सहसा पार्श्वर्तिन: भार्या शीला आगत्य प्रार्थितवती-भगिनि !अद्य मम गृहे चत्वार: अतिथय: आगता: कृपया मह्यं स्वकीया तूलिकां देहि ।अहं असत्यं अवदम् –मम पत्यु: मित्रमपि आगन्ता अस्ति ।अत: दातुम अस्मि असमर्था । सा गता। अहं प्रत्यागत्य स्व पत्यु: पुरतो अकथयम्-नित्यमेव तूलिकां याचमाना इयं लज्जां नानुभवति ।इदं श्रुत्वा मम पति अवदत्-शोभनम् , मिथ्या भाषणमेव निदानम् ।

क्षणं तूष्णीक: मम पति उक्तवान्-प्रिये!अद्य तु अति शीत: अस्ति । तूलिका अपि हिममिव प्रतीयते ।भवतु ,हसन्तीम् आनयामि इत्युक्त्वा अहं आनीतवती । आवां हसन्त्या: समीपे अतिष्ठाव ।मम पति: अभाषत्-शीतेऽस्मिन् पार्श्ववर्तिनी शीला कथं शैत्यं सहते ?तूलिका तु अस्त्येव ।एकस्य दिनस्य प्रयोगेण क्षीणा तु नैव भविष्यति ।दत्वा शीघ्रमेव आगच्छामि इत्युक्त्वा अहं तस्या गृहम् गता । यदा प्रत्यागता मम पतिसुखेन सुप्त: आसीत् ।अहमपि तत्क्षणमेव प्रसुप्ता ।



ऊँचाई


सुकेश साहनी

उदघाट्न समारोह में बहुत से रंगबिंरगे, खुबसूरत, गोल–मटोल गुब्बारों के बीच एक काला, बदसूरत गुब्बारा भी था, जिसकी सभी हँसी उड़ा रहे थे।
‘‘देखो, कितना बदसूरत है,’’ गोरे चिट्टे गुब्ब्बारे ने मुँह बनाते हुए कहा, ‘‘देखते ही उल्टी आती है।’’
‘‘अबे, मरियल!’’ सेब जैसा लाल गुब्बारा बोला, ‘‘तू तो दो कदम में ही टें बाल जाएगा, फूट यहाँ से!’’
‘‘भाइयों! ज़रा इसकी शक्ल तो देखो,’’ हरे–भरे गुब्बारे ने हँसते हुए कहा, ‘‘पैदाइशी भुक्खड़ लगता है।’’
सब हँसने लगे, पर बदसूरत गुब्बारा कुछ नहीं बोला। उसे पता था ऊँचा उठना उसकी रंगत पर नहीं बल्कि उसके भीतर क्या है, इस पर निर्भर है।
जब गुब्बारे छोड़े गए तो काला, बदसूरत गुब्बारा सबसे आगे था।

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Sunday, February 14, 2010

दीमक

सुकेश साहनी

“किसन !—” बड़े साहब ने चपरासी को घूरते हुए पूछा, “तुम मेरे कक्ष से क्या चुराकर ले जा रहे थे?”
“ कुछ नहीं साहब।”
“झूठ मत बको!—” बड़े साहब चिल्लाए, “चौकीदार ने मुझे रिपोर्ट किया है, तुम डिब्बे में कुछ छिपाकर ले जा रहे थे—क्या था उसमें? सच-सच बता दो नहीं तो मैं पुलिस में तुम्हारे खिलाफ—”
“नहीं—नहीं साहब! आप मुझे गलत समझ रहे हैं—” किसन गिड़गिड़ाया, “मैं आपको सब कुछ सच-सच बताता हूँ—मेरे घर के पास सड़क विभाग के बड़े बाबू रहते हैं, उनको दीमक की जरूरत थी, आपके कक्ष में बहुत बड़े हिस्से में दीमक लगी हुई है । बस—उसी से थोड़ी-सी दीमक मैं बड़े बाबू के लिए ले गया था। इकलौते बेटे की कसम !—मैं सच कह रहा हूँ ।”
“बड़े बाबू को दीमक की क्या जरूरत पड़ गई !” बड़े साहब हैरान थे।
“मैंने पूछा नहीं,” अगर आप कहें तो मैं पूछ आता हूँ ।”
“नहीं—नहीं,” मैंने वैसे ही पूछा, “—अब तुम जाओ।” बड़े साहब दीवार में लगी दीमक की टेढ़ी-मेढ़ी लंबी लाइन की ओर देखते हुए गहरी सोच में पड़ गए।
“मिस्टर रमन!” बड़े साहब मीठी नज़रों से दीवार में लगी दीमक की ओर देख रहे थे, “आप अपने कक्ष का भी निरीक्षण कीजिए, वहां भी दीमक ज़रूर लगी होगी, यदि न लगी हो तो आप मुझे बताइए, मैं यहाँ से आपके केबिन में ट्रांसफर करा दूँगा। आप अपने खास आदमियों को इसकी देख-रेख में लगा दीजिए, इसे पलने-बढ़ने दीजिए । आवश्यकता से अधिक हो जाए तो काँच की बोतलों में इकट्ठा कीजिए, जब कभी हम ट्रांसफर होकर दूसरे दफ्तरों में जाएँगे, वहाँ भी इसकी ज़ररूरत पड़ेगी।”
“ठीक है, सर! ऐसा ही होगा—” छोटे साहब बोले। “देखिए—” बड़े साहब का स्वर धीमा हो गया-“हमारे पीरियड के जितने भी नंबर दो के वर्क-आर्डर हैं, उनसे सम्बंधित सारे कागज़ात रिकार्ड रूम में रखवाकर वहाँ दीमक का छिड़काव करवा दीजिए—न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।”

Saturday, May 23, 2009

ਠੰਡੀ ਰਜਾਈ



ਸੁਕੇਸ਼ ਸਾਹਨੀ

“ ਕੌਣ ਸੀ ?” ਉਹਨੇ ਅੰਗੀਠੀ ਵੱਲ ਹੱਥ ਫੈਲਾ ਕੇ ਸੇਕਦੇ ਹੋਏ ਪੁੱਛਿਆ ।
“ ਉਹੀ, ਸਾਹਮਣੇ ਵਾਲਿਆਂ ਦਿਓਂ,” ਪਤਨੀ ਨੇ ਕੁੜ੍ਹ ਕੇ ਸੁਸ਼ੀਲਾ ਦੀ ਨਕਲ ਉਤਾਰੀ, “ ਭੈਣ, ਰਜਾਈ ਦੇ ਦੇ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਦੋਸਤ ਆਏ ਨੇ ।” ਫੇਰ ਉਹ ਰਜਾਈ ਉੱਪਰ ਲੈਂਦੀ ਹੋਈ ਬੁੜਬੁੜਾਈ, “ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਨਿੱਤ ਰਜਾਈ ਵਰਗੀ ਚੀਜ਼ ਮੰਗਦਿਆਂ ਸ਼ਰਮ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ । ਮੈਂ ਤਾਂ ਸਾਫ ਮਨ੍ਹਾ ਕਰਤਾ । ਕਹਿਤਾ, “ ਅੱਜ ਸਾਡੇ ਵੀ ਕੋਈ ਆਉਣ ਵਾਲਾ ਹੈ ।”
“ ਠੀਕ ਕੀਤਾ।” ਉਹ ਵੀ ਰਜਾਈ ਵਿਚ ਦੁਬਕਦਾ ਹੋਇਆ ਬੋਲਿਆ, “ ਇਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਇਹੀ ਇਲਾਜ ਐ ।”
“ ਬਹੁਤ ਠੰਡ ਐ !” ਉਹ ਬੁੜਬੁੜਾਇਆ ।
“ ਮੇਰੇ ਆਪਣੇ ਹੱਥ-ਪੈਰ ਸੁੰਨ ਹੋਈ ਜਾ ਰਹੇ ਨੇ ।” ਪਤਨੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਮੰਜੇ ਨੂੰ ਮਘਦੀ ਅੰਗੀਠੀ ਦੇ ਹੋਰ ਨੇੜੇ ਘੜੀਸਦੇ ਹੋਏ ਕਿਹਾ ।
“ ਰਜਾਈ ਤਾਂ ਜਿਵੇਂ ਬਿਲਕੁਲ ਬਰਫ਼ ਵਰਗੀ ਹੋ ਰਹੀ ਐ, ਨੀਂਦ ਆਵੇ ਵੀ ਤਾਂ ਕਿਵੇਂ ।” ਉਹ ਪਾਸਾ ਪਰਤਦਾ ਹੋਇਆ ਬੋਲਿਆ ।
“ ਨੀਂਦ ਦਾ ਤਾਂ ਕਿਤੇ ਪਤਾ ਈ ਨਹੀਂ ।” ਪਤਨੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, “ ਇਸ ਠੰਡ ’ਚ ਤਾਂ ਰਜਾਈ ਵੀ ਬੇਅਸਰ ਜਿਹੀ ਹੋ ਗਈ ਐ ।”
ਜਦੋਂ ਕਾਫੀ ਦੇਰ ਤਕ ਨੀਂਦ ਨਹੀਂ ਆਈ ਤਾਂ ਉਹ ਦੋਨੋਂ ਉੱਠ ਕੇ ਬੈਠ ਗਏ ਤੇ ਅੰਗੀਠੀ ਉੱਤੇ ਹੱਥ ਸੇਕਣ ਲੱਗੇ ।
“ ਇਕ ਗੱਲ ਕਹਾਂ, ਬੁਰਾ ਤਾਂ ਨਹੀਂ ਮੰਨੇਂਗੀ ?” ਪਤੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ।
“ ਕਿਹੋ ਜਿਹੀ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਓ !”
“ ਅੱਜ ਜਬਰਦਸਤ ਠੰਡ ਐ, ਸਾਹਮਣੇ ਵਾਲਿਆਂ ਦੇ ਮਹਿਮਾਨ ਵੀ ਆਏ ਨੇ । ਅਜਿਹੇ ’ਚ ਰਜਾਈ ਬਿਨਾ ਕਾਫੀ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ਹੋ ਰਹੀ ਹੋਵੇਗੀ ।”
“ ਹਾਂ, ਫਿਰ ?” ਉਹਨੇ ਆਸ ਭਰੀ ਨਿਗਾਹ ਨਾਲ ਪਤੀ ਵੱਲ ਵੇਖਿਆ ।
“ ਮੈਂ ਸੋਚ ਰਿਹਾ ਸੀ…ਮੇਰਾ ਸਤਲਬ ਇਹ ਸੀ ਕਿ…ਸਾਡੇ ਕੋਲ ਇਕ ਰਜਾਈ ਫਾਲਤੂ ਹੀ ਤਾਂ ਪਈ ਐ ।”
“ ਤੁਸੀਂ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਮਨ ਦੀ ਗੱਲ ਕਹਿਤੀ । ਇਕ ਦਿਨ ਵਰਤਨ ਨਾਲ ਰਜਾਈ ਘਸ ਥੋੜਾ ਨਾ ਜਾਊਗੀ ।” ਉਹ ਉੱਛਲ ਕੇ ਖੜੀ ਹੋ ਗਈ, “ ਮੈਂ ਹੁਣੇ ਸੁਸ਼ੀਲਾ ਨੂੰ ਰਜਾਈ ਦੇ ਆਉਨੀ ਆਂ ।”
ਉਹ ਸੁਸ਼ੀਲਾ ਨੂੰ ਰਜਾਈ ਦੇ ਕੇ ਮੁੜੀ ਤਾਂ ਉਹਨੇ ਹੈਰਾਨੀ ਨਾਲ ਵੇਖਿਆ, ਉਹ ਉਸੇ ਠੰਡੀ ਰਜਾਈ ਵਿਚ ਘੋੜੇ ਵੇਚ ਕੇ ਸੌਂ ਰਿਹਾ ਸੀ ।
ਉਹ ਵੀ ਉਬਾਸੀਆਂ ਲੈਂਦੀ ਹੋਈ ਆਪਣੇ ਬਿਸਤਰ ਵਿਚ ਘੁਸ ਗਈ । ਉਹਨੂੰ ਹੈਰਾਨੀ ਹੋਈ, ਰਜਾਈ ਕਾਫੀ ਗਰਮ ਸੀ ।

अनुवाद : ਸ਼ਿਆਮ ਸੁੰਦਰ ਅਗਰਵਾਲ/श्याम सुन्दर अग्रवाल

Wednesday, January 28, 2009

ਸਿਓਂਕ

ਸੁਕੇਸ਼ ਸਾਹਨੀ

“ਕਿਸ਼ਨ!---” ਵੱਡੇ ਸਾਹਬ ਨੇ ਚਪੜਾਸੀ ਨੂੰ ਘੂਰਦੇ ਹੋਏ ਪੁੱਛਿਆ, “ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਦਫ਼ਤਰ ‘ਚੋਂ ਕੀ ਚੁਰਾ ਕੇ ਲਿਜਾ ਰਿਹਾ ਸੀ?”“ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਸਾਹਬ!”“ਝੂਠ ਨਾ ਬਕ!---” ਵੱਡਾ ਸਾਹਬ ਚੀਕਿਆ, "ਚੌਂਕੀਦਾਰ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਸੂਚਨਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ, ਤੂੰ ਡੱਬੇ ‘ਚ ਕੁਝ ਛੁਪਾ ਕੇ ਲਿਜਾ ਰਿਹਾ ਸੀ---ਕੀ ਸੀ ਉਹਦੇ ‘ਚ? ਸੱਚ-ਸੱਚ ਦੱਸ ਦੇ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਪੁਲਸ ‘ਚ ਤੇਰੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼----” “ਨਹੀਂ ---ਨਹੀਂ ਸਾਹਬ! ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਗਲਤ ਸਮਝ ਰਹੇ ਓ---” ਕਿਸ਼ਨ ਬੇਨਤੀ ਕਰਦਿਆਂ ਬੋਲਿਆ, “ ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸਭ ਕੁੱਝ ਸੱਚ-ਸੱਚ ਦੱਸਦਾ ਹਾਂ---ਮੇਰੇ ਘਰ ਦੇ ਕੋਲ਼ ਸੜਕ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਵੱਡੇ ਬਾਬੂ ਰਹਿੰਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਿਓਂਕ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਸੀ, ਤੁਹਾਡੇ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਬਹੁਤ ਵੱਡੇ ਹਿੱਸੇ ‘ਚ ਸਿਓਂਕ ਲੱਗੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਬੱਸ---ਓਹਦੇ ਵਿਚੋਂ ਥੋੜ੍ਹੀ ਜਿਹੀ ਸਿਓਂਕ ਮੈਂ ਵੱਡੇ ਬਾਬੂ ਲਈ ਲੈਣ ਗਿਆ ਸੀ। ਇਕਲੌਤੇ ਬੇਟੇ ਦੀ ਕਸਮ! ---ਮੈਂ ਸੱਚ ਬੋਲ ਰਿਹਾਂ ਹਾਂ।”“ਹੈਂ! ਵੱਡੇ ਬਾਬੂ ਨੂੰ ਸਿਓਂਕ ਦੀ ਕੀ ਲੋੜ ਪੈ ਗਈ?” ਵੱਡਾ ਸਾਹਬ ਹੈਰਾਨ ਸੀ।“ਮੈਂ ਪੁੱਛਿਆ ਨਹੀਂ, ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਆਖੋਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਪੁੱਛ ਆਉਂਨਾ ਵਾਂ।”“ਨਹੀਂ—ਨਹੀਂ, ਮੈਂ ਤਾਂ ਊਈਂ ਪੁੱਛਿਐ, ----ਹੁਣ ਤੂੰ ਜਾਹ।” ਵੱਡਾ ਸਾਹਬ ਕੰਧ ਤੇ ਲੱਗੀ ਸਿਓਂਕ ਦੀ ਟੇਢੀ-ਮੇਢੀ ਲਾਈਨ ਵੱਲ ਦੇਖਦਾ ਹੋਇਆ ਗਹਿਰੀ ਸੋਚ ‘ਚ ਪੈ ਗਿਆ।.......“ਮਿਸਟਰ ਰਮਨ!” ਵੱਡਾ ਸਾਹਬ ਮਿੱਠੀਆਂ ਨਜ਼ਰਾਂ ਨਾਲ਼ ਕੰਧ ‘ਤੇ ਲੱਗੀ ਸਿਓਂਕ ਨੂੰ ਦੇਖ ਰਿਹਾ ਸੀ, “ ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੇ ਦਫ਼ਤਰ ਦਾ ਵੀ ਮੁਆਇਨਾ ਕਰੋ, ਓਥੇ ਵੀ ਸਿਓਂਕ ਜ਼ਰੂਰ ਲੱਗੀ ਹੋਊ, ਜੇ ਨਾ ਲੱਗੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਦੱਸਿਓ, ਮੈਂ ਏਥੋਂ ਤੁਹਾਡੇ ਕੈਬਿਨ ‘ਚ ਟਰਾਂਸਫਰ ਕਰ ਦੇਵਾਂਗਾ। ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੇ ਖਾਸ ਆਦਮੀਆਂ ਨੂੰ ਇਸਦੀ ਦੇਖ-ਰੇਖ ‘ਚ ਲਗਾ ਦਿਓ, ਇਹਨੂੰ ਪਲ਼ਣ-ਵਧਣ ਦਿਓ। ਜ਼ਰੂਰਤ ਤੋਂ ਵੱਧ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਕੱਚ ਦੀਆਂ ਬੋਤਲਾਂ ‘ਚ ਇਕੱਠੀ ਕਰਕੇ, ਜਦੋਂ ਕਿਤੇ ਵੀ ਆਪਾਂ ਟਰਾਂਸਫਰ ਹੋ ਕੇ ਦੂਜੇ ਦਫ਼ਤਰਾਂ ‘ਚ ਜਾਵਾਂਗੇ, ਤਾਂ ਇਹਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਪਵੇਗੀ।”“ਠੀਕ ਹੈ, ਸਰ! ਏਦਾਂ ਹੀ ਹੋਵੇਗਾ---” ਛੋਟਾ ਸਾਹਬ ਬੋਲਿਆ।“ਦੇਖੋ!---” ਵੱਡੇ ਸਾਹਬ ਦਾ ਸੁਰ ਨੀਵਾਂ ਹੋ ਗਿਆ—“ ਸਾਡੇ ਕਾਰਜ-ਕਾਲ ਦੇ ਜਿੰਨੇ ਵੀ ਨੰਬਰ ਦੋ ਦੇ ਵਰਕ ਆਰਡਰ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ਼ ਸਬੰਧਤ ਸਾਰੇ ਕਾਗਜ਼ਾਤ ਰਿਕਾਰਡ ਰੂਮ ‘ਚ ਰਖਵਾ ਕੇ ਓਥੇ ਸਿਓਂਕ ਦਾ ਛਿੜਕਾ ਕਰਵਾ ਦਿਓ---ਨਾ ਰਹੇਗਾ ਬਾਂਸ ਨਾ ਵੱਜੇਗੀ ਬੰਸਰੀ।”
ਹਿੰਦੀ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬੀ ਅਨੁਵਾਦ: ਤਨਦੀਪ 'ਤਮੰਨਾ'

Wednesday, October 1, 2008

कहानी का बीज रूप नहीं है लघुकथा

कहानी का बीज रूप नहीं है लघुकथा

सुकेश साहनी

 

        लघुकथा को लेकर अक्सर कहा जाता रहा है कि लघुकथा कहानी का बीजरूप है, लघुकथा में जीवन की व्याख्या संभव नहीं है,जिन विषयों पर कहानी, उपन्यास आदि लिखे जाते हैं उनपर लघुकथाएँ नहीं लिखी जा सकतीं। जीवन की सच्चाई इतनी गहरी है कि लघुकथा में समाहित नहीं हो सकती, लघुकथा जीवन की विसंगतियों की झलक दे सकती है, बस।

        इन टिप्पणियों में से अधिकतर का उत्तर आज लिखी जा रही लघुकथाओं ने दे दिया है, पर इसके विषय लेकर को भ्रम की आज भी स्थिति बनी हुई है। क्या पुलिस, भिखारी, नेता, भ्रष्टाचार आदि ही लघुकथा के विषय हो सकते हैं? क्या उपन्यास कहानी के विषय और लघुकथा के विषय भिन्न–भिन्न प्रकार के होते हैं? जिस विषय पर लघुकथा लिखी गई हो, उस पर कहानी नहीं लिखी जा सकती या ठीक इससे उलट जैसी टिप्पणियाँ लघुकथा विषयक लेखों में प्राय: देखने को मिल जाती हैं।

        लघुकथा में विषय को लेकर जब हम विचार करते है तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट होकर सामने आती है कि लघुकथा भी साहित्य की दूसरी विधाओं की भाँति किसी भी विषय पर लिखी जा सकती है। भ्रम की स्थिति वहां उत्पन्न होती है जहाँ विषय को लघुकथा के कथ्य के साथ गड्ड–मड्ड करके देखा जाता है। लघुकथा भी अन्य विधाओं की भाँति किसी विषय विशेष को रेशे–रेशे की पड़ताल करने में सक्षम है। ऐसी सशक्त लघुकथाओं के संकलन सम्पादित करने की बात मेरे मन में आई थी। इन संकलनों की रचनाएँ इस दृष्टि से आश्वस्त करती हैं कि लघुकथा लेखकों ने एक ही विषय के विभिन्न पहलुओं पर अपनी कलम चलाई है और उस विषय का कोई कोना उनके लेखन से अछूता नहीं है। लघुकथा इस दृष्टि से काफी समृद्ध हो चुकी है।

यहाँ यह भ्रम की स्थिति भी दूर होनी चाहिए कि जिन विषयों पर लघुकथाएँ लिखी गई हों,उनपर कहानी नहीं लिखी जा सकती या लिखी गई कहानी के विषय पर लघुकथा के साथ जुड़े लघु शब्द को उसके शाब्दिक अर्थ में न समझा जाए बल्कि आकारगत लघुता की दृष्टि से देखा जाए। कई प्रतिष्ठित रचनाकार भी इस अंतर को समझने का प्रयास नहीं करते। मेरे एक वरिष्ठ कवि मित्र हैं, वे लघुकथा को कहानी का बीजरूप मानते हैं। उनकी दृष्टि में लघुकथा लिखना आसान है और कहानी लिखना मुश्किल। चूँकि बात विषय को लेकर चल रही थी तो इसी सन्दर्भ में बात आगे बढ़ाना उचित होगा। 'कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूढ़े बन माँहि' इस विषय पर उपन्यास भी लिखा गया है, कहानी और लघुकथा भी। तो यहाँ प्रश्न उठता है कि विषय की दृष्टि से कौन सी ऐसी विभाजक रेखा है जो लघुकथा को अन्य विधाओं से अलग करती है?

        लघुकथा में लेखक सम्बंधित विषय का मूल स्वर पकड़ता है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मूल स्वर का अभिप्राय मोटी बात से नहीं है बल्कि  इसका तात्पर्य रचना में संबंधित विषय और कथ्य के मूल (सूक्ष्म) स्वर से है। यही बिन्दु लघुकथा को कहानी से अलग करता है।

        लघुकथा में लेखक सम्बंधित विषय से जुड़े किसी बिन्दु पर फोकस करता है। फोकस की प्रक्रिया यांत्रिक नहीं होती बल्कि इसमें–(1) लेखक के दिलो दिमाग में बरसों से छाए अहसास (2) अकस्मात् प्राप्त सूक्ष्मदर्शी दृष्टि (3) विषय से सम्बंधित कुछ  विचार (कथ्य) सम्मिलित हैं।  इस प्रक्रिया में उपन्यास कहानी की भाँति वर्षो लग सकते हैं।

यदि विषय को पेड़ मान लें और लघुकथा में उस पेड़ की एक अथवा दो पत्तियों के हरे पदार्थ, आपसी सम्बंध,स्टॉमेटा और उनसे हो रहे एवैपोट्रांसपरेशन की बात की जाए तो उसे आसान कथारूप या कहानी का बीजरूप कैसे कहा जा सकता है। यह एक जटिल सृजन प्रक्रिया है, जिसे विच्छेदन किए बिना (विषय की डैप्थ में उतरे बिना) प्राप्त करना असम्भव है।

'स्कूल' लघुकथा का उल्लेख करना चाहूँगा–गाँव के छोटे से स्टेशन के प्लेटफार्म पर औरत बेचैनी से अपने बच्चे की राह देख रही है, जो तीन दिन पहले टोकरी भर चने लेकर पहली दफा घर से काम पर निकला है। परेशान औरत बार–बार ट्रेन के बारे में पूछती है तो स्टेशन मास्टर झल्ला जाता है। वह गिड़गिड़ाते हुए उसे बताती है कि बच्चे के पिता नहीं है, वह दरियाँ बुनकर खर्चा चलाती है। बेटा काम करने की जिद करके घर से निकला है। औरत बहुत चिन्तित है क्योंकि उसका बेटा बहुत भोला है, उसे रात में अकेले नींद नहीं आती है, उसी के पास सोता है । इतनी सर्दी में उसके पास ऊनी कपड़े भी तो नहीं हैं। दो रातें उसने कैसे काटी होंगी। सोचकर वह सिसकने लगती है। वह मन ही मन निर्णय करती है कि अपने बेटे को फिर कभी अपने से दूर नहीं भेजेगी।

आखिर ट्रेन शोर मचाती हुई उस सुनसान स्टेशन पर खड़ी होती है।

एक आकृति दौड़ती हुई उसके नजदीक आती है। वह देखती है–तनी हुई गर्दन...बड़ी–बड़ी आत्मविश्वास भरी आँखें....कसे हुए जबड़े.....होठों पर बारीक मुस्कान.....

''माँ तुम्हें इतनी रात गए यहां नहीं आना चाहिए था।'' अपने बेटे की गम्भीर चिन्ता भरी आवाज उसके कानों में पड़ती है। वह हैरान रह जाती है....इन तीन दिनों में उसका बेटा इतना बड़ा कैसे हो गया!

यह दुनिया सबसे बड़ी पाठशाला है,' लघुकथा में इस मूल स्वर को पकड़ने का प्रयास किया गया है। इसी विषय पर मैक्सिम गोर्की का आत्मकथात्मक उपन्यास भी पढ़ने को मिल जाएगा। इस विषय को लेकर कहानी भी लिखी जा सकती है।

लघुकथा की सीमाएं क्या होनी चाहिए? साहित्य की किसी भी विधा को किसी भी सीमा में बांधना उचित नहीं है। रचनाकार के भीतर स्वाभाविक रूप से तैयार हुई रचना अपने आप में मुकम्मल कृति होती है। लघुकथा भी इसका अपवाद नहीं है। लघुकथा को कई लोगों ने शब्द सीमा में बांधने की बात की है। पर हम देखते हैं कि सौ शब्दों में गुंथी लघुकथा भी उतना ही प्रभाव छोड़ती है जितना कोई दूसरी पांच–छह सौ शब्दों की लघुकथा लघुकथा का विषय, कथ्य और उससे सम्बन्धित कुछ विचार मिलकर उसका आकार बनाते हैं, फिर उसे शब्द सीमा में कैसे बाँधा जा सकता है?

पहले भी कहा गया है कि लेखक लघुकथा में मूल स्वर पकड़ता है और उसी को केन्द्र में रखकर कथ्य विकास अतिरिक्त रचना कौशल एवं अनुशासन की माँग करता हैं यहां अनुशासन लघुकथा के शीर्षक और समापन बिन्दु पर भी लागू होता है, जिसके अभाव में लघुकथा अपना फ़ॉर्म खो बैठती है। रमेश बत्तरा की लघुकथा सूअर के माध्यम से लघुकथा के लिए अनिवार्य अनुशासन (अंकुश) को समझा जा सकता है। लेखक छोटे–छोटे चुस्त वाक्यों के जरिए कामगार कथानायक की दैनिकचर्या,असामाजिक तत्वों का चरित्र उभारता है। समापन बिन्दु देखें, ''तो नींद क्यों खराब करते है भाई! रात की पाली में कारखाने जाना है,'' वह करवट लेकर फिर से सोता हुआ बोला, ''यहाँ क्या कर रहे हो? जाकर सूअर को मारो न?'' सूअर में जो अर्थ व्यंजित होता है ;वह सम्पूर्ण साम्प्रदायिक मानसिकता पर  प्रहार करता है ।

अत: लघुकथा को सीमाओं में बांधने की बात छोड़कर इसमें अनुशासन की बात को समझा जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक सशक्त लघुकथाएँ सामने आएँ।