Tuesday, March 11, 2008

खरोंच



सुकेश साहनी

रात काफी बीत चुकी थी,पर उस हॉल में बैठे लोगों की आँखों से नींद कोसों दूर थी। रोज की तरह न तो उनके कहकहे गूंज रहे थे और न ही उनके बीच एक–दूसरे को किस्से सुनाने की होड़ थी।
वे सब शहर के बाहर स्थित चूजे(चिकेन) तैयार करने वाली फैक्ट्री के वर्कर थे। दिन भर काम करने के बाद रात में वे फैक्ट्री के बेसमेंट में जमा हो जाते थे। फिर शुरू होता था हँसी–मजाक,किस्से–कहानियां सुनने–सुनाने का सिलसिला,जो देर रात तक जारी रहता था। जब उनकी आँखें झपकने लगतीं, जबान साथ छोड़ देती, तभी वे सोने का नाम लेते थे। इस तरह वे वर्षो से एक परिवार की तरह वहां रहते आ रहे थे। इसी परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य–मास्टर ने आज अचानक नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। उसने इस्तीफे की वजह किसी को नहीं बताई थी। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के बीस बेशकीमती वर्ष फैक्ट्री को दिए हों,उसका एकाएक इस तरह बिना कुछ कहे नौकरी छोड़कर चल देना,किसी के गले नहीं उतर रहा था। इस घटना ने उन सबको उदास कर दिया था।
मास्टर की निजी जिंदगी के बारे में उसके साथी भी अधिक कुछ नहीं जानते थे। फैक्ट्री में उसका दबदबा था, मालिक उसकी कद्र करते थे। ब्राइलर इंडस्ट्री के कुछ अति महत्वपूर्ण काम मास्टर के जिम्मे थे, जिनमें उसे मास्टरी हासिल थी। शायद इसी वजह से उसका नाम मास्टर पड़ गया था। फैक्ट्री में असेम्बली लाइनों और कन्वेयर बेल्टों के माध्यम से हजारों चूजों को मांस के लिए रोज मारा जाता था। इस काम को करने में दूसरे वर्कर कतराते थे,पर मास्टर इसे 'मोगैम्बो खुश हुआ' की तर्ज पर करने को हरदम तैयार रहता था। गोदाम में चूजों को पंक्तिबद्व क्रेटों में जिस तरह ठूंस–ठूंसकर रखा जाता था,उसमें उनके एक–दूसरे को चोंच मार–मारकर मार डालने का खतरा बना रहता था। इस समस्या के समाधान के लिए चूजों के पैदा होते ही उनकी चोचों को गर्म ब्लेड वाली मशीन(डिबीकर) से काट दिया जाता था। यह काम भी मास्टर के जिम्मे था। चोचें काटने का काम वह इतनी तेजी से करता था कि देखने वाले दंग रह जाते थे। यह काम करते हुए उसके होठों पर सदैव एक क्रूर मुस्कान चिपकी रहती थी।
पिछले हफ्ते मास्टर को मालिकों के आदेश पर अंडों से लदे ट्रकों के साथ लखनऊ जाना पड़ा था। वहां से लौटने के बाद वह काफी बदला–बदला नजर आने लगा था। रात की महफिलों में उसकी रुचि खत्म हो गई थी। ब्लेड से चूजों की चोंचें काटते हुए उसके होठों पर रेंगने वाली चिरपरिचित क्रूर मुस्कान नदारद थी,हाथ कांपने लगे थे। उसकी इस कमजोरी की वजह से बहुत से चूजों के मुंह में फफोले पड़ गए थे, जीभें कट गई थीं। इस घटना ने उसे इतना विचलित कर दिया था कि वह घंटों गुमसुम–सा बैठा रहा था। इसी घटना के बाद उसने इस्तीफा दे दिया था।
बेसमेंट में जलते बल्ब की रोशनी सीधे मास्टर के चेहरे पर पड़ रही थी। साथियों ने उसे घेर रखा था। वे सब उससे इस्तीफे की वजह जानना चाहते थे। पहले मास्टर टाल–मटोल करता रहा था,पर अंत में उनकी जिद के आगे उसने हथियार डाल दिए थे। उसकी आँखें बंद थीं,माथे पर बल पड़े हुए थे, मानो समझ न पा रहा हो कि अपनी बात कहां से शुरू करे।
बाहर शाम से ही तेज हवाएँ चल रही थीं, अब आंधी चलने लगी थी।
एकाएक बत्ती गुल हो गई और वहाँ घुप्प अंधेरा छा गया।
मास्टर को अपनी राम–कहानी सुनाने के लिए जैसे अँधेरे का सहारा चाहिए था। उसका गंभीर स्वर बेसमेंट में गूंजने लगा।
सालों पहले एक मामूली–सी बात पर नाराज होकर मैं घर से भाग आया था। उस समय घरवालों के प्रति मन में इतना गुस्सा भरा हुआ था कि मैंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा था। शुरू–शुरू में अक्सर मां की याद आती थी, तब मैं खुद को काम में इस कदर झोंक देता था कि उसके बारे में सोचने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती थी। इस तरह मैंने कोशिश कर उनकी याद को पूरी तरह दिल से बाहर निकाल फेंका था। अगर मैनेजर साहब उस दिन मुझे अंडों की सप्लाई के साथ लखनऊ न भेजते तो शायद जीते–जी मेरे मन में नौकरी से इस्तीफा देकर घर लौट जाने की बात कभी न आती।
ट्रकों के काफिले के साथ लखनऊ रवाना होते ही मैं घरवालों के बारे में सोचने लगा था...मां और बाबूजी कैसे होंगें? मां तो अक्सर बीमार रहती थीं, कहीं उन्हें कुछ हो न गया हो? ...चमकती आंखों वाला मेरा भाई ! ... अब तो उसकी शादी भी हो गई होगी....यादों की रीलें दिमाग में सरपट दौड़े जा रही थीं।
कैसरबाग गोदाम पर ट्रकों को अनलोडिंग के लिए छोड़ने के बाद मेरे पास एक दिन का समय था। घर जाऊं कि न जाऊं, यही मेरे भीतर चल रहा था। माँ की ममतामयी सूरत याद कर जो उत्साह मन में पैदा होता था, बाबूजी की याद आते ही ठंडा पड़ जाता था। अंत में मैंने यही फैसला किया कि दूर से ही उन्हें देखकर लौट आऊंगा, भीतर नहीं जाऊंगा।
मोहल्ला ठीक वैसा ही था, जैसा मेरे बचपन के दिनों में था। बस,सड़क पहले से कुछ तंग (संकरी) मालूम हो रही थी। कई परिचित चेहरे दिखाई देने लगे थे,किसी ने मुझे नहीं पहचाना। वहां की एकमात्र जनरल मचेर्ण्ट की दुकान पर मेरे बचपन का दोस्त बैठा हुआ था। दुकान के सामने मैं एक पल के लिए ठिठका,उसने उचटती–सी नजर मुझ पर डाली और काम में लग गया। मतलब साफ था इन बीस वर्षो में मैं अपनी पहचान खो बैठा था।
तिमंजिले पर स्थित घर की सीढि़यां चढ़ते हुए मैं बुरी तरह हाँफने लगा था। ये वही सीढि़यां थीं,जिन्हें मैं एक सांस में दौड़ते हुए तय कर लेता था।
मैं सोच में पड़ गया था–माँ और बाबूजी ये सीढि़यां कैसे चढ़ते–उतरते होंगे?
भीतर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। मैं बहुत देर तक असमंजस की स्थिति में दरवाजे के बाहर खड़ा रहा। फिर यह सोचकर कि मुझे वैसे भी कोई नहीं पहचानेगा, मैंने दरवाजा खटखटा दिया था।
अब बाहर आंधी तो नहीं चल रहीं थी, पर पानी बरसने लगा था। मास्टर ने थोड़ी देर की चुप्पी के बाद एक सिगरेट सुलगाई और जोरों का कश खींचा।
''फिर क्या हुआ?'' अंधेरे में से कोई बोला।
''मास्टर ,तुम किस बात पर नाराज होकर घर से भागे थे?'' किसी दूसरे ने पूछा। वे अब आगे की कहानी सुनने को अधीर हो रहे थे।
मास्टर के हाथ में सुलगती सिगरेट का सिरा अंधेरे में चमक रहा था। उसने उन्हें शांत करते हुए कहा
भाइयो, मैं उसी बात पर आ रहा हूँ–ये सब बताए बगैर बात पूरी नहीं होगी। हॉं , तो मैं दरवाजे के बाहर चुपचाप खड़ा था, दिल तेजी से धड़क रहा था। सोच रहा था कि इतने बरसों बाद पहले किसे देखूंगा? मगर दरवाजा माँ ने खोला था। मेरी नजर उनकी ठुड्डी पर ठहर गई थी। दांत गिर जाने से वह भाग कुछ अलग–सा लग रहा था। वह पहले से काफी बूढ़े लगने लगी थी।
माँ को मुझे पहचानने में एक क्षण भी नहीं लगा था। उनके लिए मैं अभी भी बच्चा था। वह मुझसे लिपटकर रोने लगी थी। उनके पास से वैसी खुशबू आ रही थी,जिससे मैं रजाइयों के ढेर में से माँ की रजाई को सूंघकर पहचान लिया करता था।
''कहां रहा इतने बरस?''
मुझे कुछ कहते नहीं बना।
''कितना पक्का दिल है तेरा।''
मैं चुप रहा।
''तुझे हमारी जरा भी याद नहीं आई?''
मैंने थूक गटका।
इतने बरसों में एक बार भी मां की सुध लेने का ख्याल नहीं आया। माँ से। तो मेरी कोई नाराजगी भी नहीं थी। मैं खुद को धिक्कारने लगा था।
मां सवाल–पर–सवाल किए जा रही थी,मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। मैं उन दिनों में पहुँच गया था,जब मैं मुँह में अगूंठा डाले मां की गोद में लेटा रहता था।
''कौन आया है?'' ड्योढ़ी के उस पार से बाबूजी की आवाज सुनाई दी, इतने बरसों बाद भी पीठ में झुरझुरी–सी दौड़ गई। बाबूजी का गुस्सा बहुत तेज था। उनके डर से पेड़ों पर बैठे पक्षी तक खामोश हो जाते थे। उन दिनों वह जितनी देर तक घर में रहते थे,हम दोनों भाई चूहों की मानिंद अपने–अपने बिलों में दुबके रहते थे। उनके सामने तो सांस भी सोच–समझकर लेनी पड़ती थी।
मां के साथ कमरे में आया तो उन्हें देखता ही रह गया...बूढ़ा चेहरा..भीगी आंखें....कांपता स्वर...। कहाँ गया उनका तेज–तर्रार,दबंग व्यक्तित्व।
मैंने आगे बढ़कर उनके पांव छुए । उन्होंने दोनों हाथों से टटोलकर मुझे महसूस किया,होठों में कुछ बुदबुदाए,जो मेरी समझ में नहीं आया। शून्य में ताकती उनकी आँखें भर आई थीं। वे बहुत असहाय–से लग रहे थे। वह अभी भी अपने आप से बातें किए जा रहे थे। मैंने हैरानी से माँ की ओर देखा...।
''बेटा, इनकी आंखों की रोशनी चली गई है,'' मां ने बताया, ''तेरे जाने के बाद हम पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था।''
माँ सिसकने लगी थी।
''थका होगा, आराम करने दो।'' बाबूजी के स्वर की कोमलता पर मैं दंग था...क्या यह वही बाबूजी हैं,जिनकी डांट से ही मेरी पैंट गीली हो जाया करती थी?
घर की हालत खस्ता नजर आ रही थी। हर चीज से आर्थिक संकट जैसे बाहर झांक रहा था।
मेरी नजर छोटे भाई पर पड़ी। वह अपने बेटे को चुप कराने में लगा हुआ था, जो न जाने कब से रोए जा रहा था। भाई की आँखों में पहले जैसी चमक दिखाई नहीं दे रही थी। मुझे देखकर उसके चेहरे पर खुशी का कोई चिह्न नजर नहीं आया। एकबारगी मुझे लगा उसकी आँखें अपनी बेरोजगारी के लिए मुझे उलाहना दे रही हैं। उसने मुझसे बात नहीं की। थोड़ी–थोड़ी देर बाद बुझी–बुझी आँखों से मेरी ओर देख लेता था,बस।
''चिडि़या!...मेरी चिडि़या!!''
बच्चा रोते–रोते कहे जा रहा था।
इसी बीच भाई की पत्नी ने आकर मेरे पांव छुए। पति की बेरोजगारी ने उसे भी निचोड़कर रख दिया था।
सबका ध्यान बच्चे की तरफ था।
''अच्छे बच्चे रोते नहीं हैं, अभी मिल जाएगी तुम्हारी चिडि़या।'' भाई ने कहा।
''कहीं बक्सों के नीचे न चली गई हो?'' माँ ने संभावना व्यक्त की।
''एक बार सारा सामान हटाकर देख तो लो।'' बाबूजी ने सुझाया।
''हर कहीं देख लिया है, बाबूजी !'' भाई ने बताया।
''थोड़ी देर पहले मैंने उसे यहीं दरवाजे के पास पानी पिलाया था।'' बबलू ने रोते हुए बताया।
हुआ ये था कि बबलू को पड़ोस के मंदिर में चिडि़या का बच्चा पड़ा मिला था। बच्चे ने अभी उड़ना नहीं सीखा था। कोई कुत्ता–बिल्ली उसे खा न जाए, इसलिए वह उसे घर ले आया था। पिछले दो दिनों से उसकी सारी दुनिया चिडि़या के उस बच्चे के इर्द–गिर्द ही सिमट आई थी। थोड़ी देर पहले अचानक वह कहीं गुम हो गया था। इसी वजह से बबलू रोए जा रहा था।
अब पूरा घर उस चिडि़या के बच्चे को लेकर परेशान था।
अंधेरे में कोई खी–खी कर हंसने लगा।
''एक चिडि़या के बच्चे के लिए...वाह!'' दूसरा हंसा।
''मास्टर! हमें भी बच्चा समझा है क्या?'' किसी और ने खिल्ली उड़ाई।
''चुप रहो!'' चौथे ने सबको डांटा, ''इसका भी कोई मतलब होगा। मास्टर तुम आगे कहो, हम सुन रहे हैं।''
मास्टर ने उसकी उसकी हंसी की परवाह किए बिना अपनी बात जारी रखी। हम यहाँ सैकड़ों चूजों को रोज मार देते हैं। उन सबको वहां एक चिडि़या के बच्चे के लिए परेशान देखकर मुझे भी हैरानी हुई थी। लगा था,वे सब अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। वर्षों बाद मैं घर लौटा था और वे सब मुझे भूलकर एक चिडि़या को ढूंढ़ रहे थे...।
''हम अपने बेटे को दूसरी चिडि़या ला देंगे।'' बहू ने बबलू को बहलाया।''
''नहीं!'' वह बोला, ''मुझे वही चिडि़या चाहिए।''
''चलो,एक बार फिर स्टोर में देख लेते हैं।'' भाई ने कहा।
भाई उसे स्टोर में ले गया।
''थोड़ी देर पहले मैंने यहां एक बिल्ली को घूमते देखा था।'' माँ ने उनके जाते ही बाबूजी के के कान में धीरे से कहा।
''क्या कहती हो?'' बाबूजी बेचैन हो उठे थे, ''यह बात बबलू को मत बताना।''
मैं हैरान था,क्या ये वही बाबूजी हैं, जिनकी दहशत से घर में चिड़िया भी पर नहीं मार सकती थी।
''मिल गया!'' तभी बबलू खुशी से चिल्लाया।
'शुक्र है भगवान का।'' बाबूजी बुदबुदाए।
''कहां मिला? '' भाई ने पूछा।
''यहां चौखट के नीचे खोखल में।''
''मुझे पता था,यहीं कहीं होगा।'' माँ हँसी।
''मैंने कहा था, मिल जाएगा!' बाबूजी चहके।
पूरा घर खुशी से झूमने लगा था।
सब चौखट के पास जमा हो गए थे। बच्चा खोखली जगह में काफी पीछे की ओर चला गया था। उसकी हल्की चीं–चीं की आवाज सुनकर बबलू ने उसे ढूंढ़ लिया था। वे उसे सुरक्षित बाहर निकालने की तरकीबें सोच रहे थे। मुझे हंसी आ रही थी,मेरे लिए तो यह चुटकियों का काम था। मैंने कहा भी–''रसोई से चिमटा ला दो,मैं अभी बाहर निकाले देता हूँ।'' पर बाबूजी को मेरा तरीका पसंद नहीं आया,उन्हें इसमें चिडि़या को चोट–चपेट लगने का खतरा दिखाई दे रहा था। उनका मानना था कि बच्चा अपने आप खाने–पीने के लिए कोटर से बाहर जरूर आएगा। यदि नहीं आएगा, तो बढ़ई को बुलाकर चौखट काटकर उसे बाहर निकाल लिया जाएगा। वे चिडि़या को बाहर निकालने के मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। बाबूजी के इस रूप की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि एकाएक बाबूजी मोम की तरह मुलायम कैसे हो गए....।
रात को मेरा बिस्तर वहीं लगा दिया गया था, जहां मैं बचपन में सोया करता था।
बिस्तर पर लेटते ही मेरी नजर बगल की दीवार पर पड़ी, फिर वहीं गड़ी रह गई। आँखों के आगे चिंगारियां छूटने लगीं। बात थी ही ऐसी। बीस साल पहले की वो घटना आँखों के आगे कौंध गई,जिसकी वजह से मैं घर से भागा था। उस दिन बाबूजी ने मुझे दीवार को लोहे के तार से खरोंचते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया था। उन्होंने मुझे इतनी बुरी तरह पीटा था कि मैं इसी बात पर नाराज होकर मैं घर से भाग आया था।
नहीं, कुछ नहीं बदला था...दीवार पर की वो बरसों पहले की खरोंच ज्यों की त्यों थी। हालांकि,इन बीस बरसों में घर की कई बार पुताई और मरम्मत हुई थी,पर मेरे द्वारा खरोंचा गया दीवार का वह हिस्सा हर बार बिना पोते छोड़ दिया गया था। खरोंच वाला भाग चिकना और मैला हो गया था,जैसे कोई उस पर अँगुलियां फेरता रहा हो....
मैं स्तब्ध था। खरोंच पर मेरी आँखें बर्फ
की
तरह जमी हुई थीं। पिछले बीस साल अचानक मेरी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल गए। उस खरोंच के एक ओर गर्म ब्लेड से चूजों की चोंच काटता मैं था,तो दूसरी ओर बूढ़ी अंगुलियों के पोरों से खरोंच को टटोलते अंधे बाबूजी थे....
इतना कहकर मास्टर खामोश हो गया था। बाहर बारिश तो थम गई थी, पर पेड़ों के पत्तों पर ठहरा पानी अभी भी टपक रहा था। सुनने वाले एकदम चुप थे। कोई कुछ नहीं पूछ रहा था। नहीं,उनमें से कोई भी नहीं सोया था। दरअसल ,मास्टर की कहानी की उस खरोंच को सभी अपने दिलों पर महसूस कर रहे थे।
‍‍

Sunday, March 2, 2008

लघुकथा-रचना -प्रक्रिया

सुकेश साहनी

सबसे पहले किसी रचना ने मेरे भीतर कब और कैसे जन्म लिया? इस विषय में जब भी सोचता हूँ तो अपने नन्हें रूप को माँ के साथ रजाई में पाता हूँ और माँ से सुनी पहली कहानी दिमाग में घूमने लगती है....सात भाइयों की इकलौती बहन मेले में जाने के लिए अपनी भाभियों से बारी–बारी से दुपट्टा माँगती है। सब मना कर देती है । बहुत मिन्नतें करने पर एक भाभी दुपट्टा दे देती है। मेले में झूला झूलते हुए दुपट्टे पर एक कौआ बीट कर देता है। बहन की लाख कोशिशों के बाद भी दुपट्टे से बीट का वह दाग साफ नहीं होता। दुपट्टे पर बीट देखकर भाभी को बहुत बुरा लगता है। वह अपने पति से जिद करती है कि दुपट्टे को बहन के खून से रंग दे तभी उसे शांति मिलेगी। भाई अपनी पत्नी के कहने पर बहन को मारकर उसके खून से दुपट्टा रंग लेता है। बहन को कत्ल कर जिस जगह गाड़ दिया जाता है, वहाँ से आम का एक पेड़ निकल आता है। वहाँ से गुज़र रहा एक धोबी पेड़ के आम तोड़ने की कोशिश करता है तो पेड़ से आवाज़ आती है, ‘‘धोबिया वै धोबिया, अम्म न तोड़, सक्के वीरे मारा भाभी शालू गिदा बोड़!’’ जब भी कोई राहगीर उस पेड़ के नज़दीक आता तो पेड़ बोल उठता–‘‘सगे वीरे मारा भाभी....’’
उस समय पेड़ का बोलना और माँ का गाकर कहना बहुत भाता था और मैं माँ से बार–बार ज़िद करके यही कहानी सुनता था। अन्य बातों को समझने की मेरी उम्र ही नहीं थी।
उपयु‍र्क्त कहानी के बारे में सोचने की शुरूआत काफी बाद में हुई। माँ से मिलने आई कोई महिला कमरे में बैठी है–मैं भी वहीं हूँ। वह मुझसे पूछती है कि हम कितने भाई–बहन हैं। मुझे उत्तर देने में देर लगती है। अँगुलियों पर गिनता हूँ और फिर उत्तर देता हूं–‘‘छह भाई, तीन बहनें” इसने तो अपने चाचा–ताऊ के बच्चों को भी गिन लिया है।’’
मुझे अच्छी तरह याद है कि माँ के शब्दों से मैं हतप्रभ रह गया था। लगा जैसे कोई अमूल्य चीज़ छीन ली गई है। सारा दिन उदासी में डूबा रहा था। शील भइया मेरे भाई नहीं हैं? शम्मी मेरी बहन नहीं है? दिल मानने को कतई तैयार नहीं था। इसी उधेड़बुन के बीच एकाएक धमाके के साथ माँ से सुनी कहानी की पंक्तियाँ दिमाग में कौंध गई: ‘‘सगे वीरे मारा भाभी शालू गिदा बोड़।’’ उस दिन अपने नन्हें दिल पर पहली बार खरोंच महसूस की। चाचा–ताऊ के बच्चे सगे भाई–बहन नहीं होते है....सगा....चचेरा!....चचेरे....सगे! सगे भाई अपनी बहन को मारकर पत्नी के लिए दुपट्टा रंग लेता है! आखिर यह चक्कर क्या है? मुझे लगता है कि दिल पर पड़ी खरोंच और मेरी भावुकता- भरी सोच के साथ पहली रचना ने मेरे भीतर जन्म लिया था।
लघुकथा के संदर्भ में भी जीवन–यात्रा के विभिन्न पल छोटे–छोटे एहसासों के रूप में दिलोदिमाग पर छा जाते हैं। अनूकूल परिस्थितियाँ पाते ही जब इनमें साहित्यिक रूप के साथ जीवन का गर्म लहू दौड़ने लगता है, जब उसके साथ उससे सम्बंधित कुछ विचार व्यवस्थित होकर घुल–मिल जाते है, तभी लघुकथा कागज़ पर उतार पाता हूँ। मेरी एक लघुकथा है–यम के वंशज। अपनी बात शायद इस रचना के माध्यम से अधिक स्पष्ट कर पाऊँ। काफी कष्ट सहकर मेरी पत्नी ने अस्पताल में पुत्र को जन्म दिया था, जिसकी चौबीस घंटे बाद मृत्यु हो गई थी।स्टाफ़-नर्स ने बच्चे का शव सुपुर्द करने से पहले एक प्रमाण–पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे, जो इस प्रकार था–‘‘मैं अपने मृत बच्चे की लाश लिये जा रहा हूँ। मैं अस्पताल में दी गई चिकित्सा से संतुष्ट हूँ। मुझे यहाँ के किसी कर्मचारी से कोई शिकायत नहीं है।’’ बच्चे का शव अस्पताल से प्राप्त करते हुए मेरी मन:स्थिति क्या रही होगी, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। प्रमाण–पत्र पर हस्ताक्षर करते समय लघुकथा लेखन या इस विषय पर गौर करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। एक एहसास ज़रूर हुआ था जो दिमाग में कहीं अंकित हो गया था।
कुछ दिनों बाद अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड में किसी सम्बन्धी को देखने जाना पड़ा। वहाँ नर्स और वार्ड ब्वाय का एक देहाती महिला के साथ दु्र्व्यवहार देखकर तबीयत खिन्न हो गई। अचानक प्रमाण–पत्र पर अपने हस्ताक्षर करने वाली घटना जीवंत होकर इस घटना के साथ घुल–मिल गई और इस प्रकार यम के वंशज के रूपमें एक लघुकथा ने जन्म लिया।
स्पष्ट है कि कथा की विषयवस्तु, लेखकीय दृष्टि एवं उससे संबंधित विचार मिलकर मुकम्मल रचना का रूप लेते हैं । मैंने यहाँ जानबूझकर रचना अथवा कथा शब्द का प्रयोग किया है ;क्योंकि उपयु‍र्क्त कथन साहित्य की किसी भी विधा के लिए प्रयोग किया जा सकता है। अधिकतर रचनाओं की विषयवस्तु हमें जीवन की हलचल से मिलती है। देखने में आ रहा है कि आज लिखी जा रही बहुत–सी लघुकथाओं में सिर्फ़ विषयवस्तु, घटना या एहसास का ब्योरा मात्र होता है। लघुकथा का भाग बनने के लिए ज़रूरी है कि इस घटना, एहसास या विचार को दिशा और दृष्टि मिले, लेखक उस पर मनन करे, उससे संबंधित विचार भी उसमें जन्म लें।
कोई स्थिति, घटना, एहसास या विचार ही हमें लिखने के लिए प्रेरित करता है। इसे हम किसी रचना के लिए कच्चा माल भी कह सकते हैं। वस्तुत: कच्चे माल के पकने की प्रक्रिया ही विषयवस्तु या घटना को दृष्टि मिलना है। लेखक के भीतर किसी रचना के लिए आवश्यक कच्चे माल के पकने की प्रक्रिया ही लेखक की रचना– प्रक्रिया है। मेरी दृष्टि में लघुकथा की रचना– प्रक्रिया में उपन्यास एवं कहानी को भाँति बरसों भी लग सकते हैं।
लघुकथा में लेखक को आकारगत लघुता की अनिवार्यता के साथ अपनी बात पाठकों के सम्मुख रखनी होती है। इसमें कहानी की भाँति कई घटनाओं, वातावरण–निर्माण एवं चरित्र–चित्रण द्वारा पाठकों को बाँधने या रिझाने का अवसर नहीं। होता है। लघुकथा का समापन–बिन्दु कहानी एवं उपन्यास की तुलना में अतिरिक्त श्रम एवं रचना–कौशल की माँग करता है। लघुकथा के समापन–बिन्दु को उस बिन्दु के रूप में समझा जा सकता है जहाँ रचना अपने कलेवर के मूल स्वर को कैरी करते हुए पूर्णता को प्राप्त होती है। मुझे लगता है कि लघुकथा की रचना–प्रक्रिया के दौरान लेखक को आकारगत लघुता एवं समापन–बिन्दु को ध्यान में रखकर ही ताने–बाने बुनने पड़ते हैं और यहीं लघुकथा की रचना– प्रक्रिया के दौरान ही पात्रों के चयन एवं लघुकथा के लिए उपयु‍र्क्त स्थल पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। कभी–कभी कोई संवाद किसी भी पात्र से कहलवा देने से लघुकथा का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। वहीं इस बिन्दु पर किया गया अतिरिक्त मनन हमें उस संवाद को किसी बच्चे के मुँह से कहलवाने के निष्कर्ष पर पहुँचा सकता है। जिससे लघुकथा का प्रभाव और भी व्यापक हो जाता हो।
अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा। मैं और भाई रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी दिल्ली से बरेली लौट रहे थे। रेल–ट्रेक में किसी खराबी के कारण हमारी ट्रेन चंदौसी स्टेशन पर पहुँच गई थी। हमें चंदौसी स्टेशन पर पाँच घंटे व्यतीत करन पड़े थे। वहाँ प्रतीक्षालय में बहुत से कॉलेज के लड़के जमा थे। वे जुआ खेल रहे थे, अश्लील चुटकुले सुना रहे थे, वहीं आसपास के माहौल से बेखबर एक स्कूली लड़का अपना होमवर्क पूरा करने में जुटा था। मैंने उससे बातचीत की थी। उसने बताया था कि वह पास के गाँव से रोज़ पढ़ने आता है। अन्य डेली पैसेंजर्स की तरह वह भी प्रतीक्षा कर रहा था। उसने यह भी बताया था कि घर में केवल उसकी माँ है। पिता बंबई में कहीं नौकरी करते हैं और साल में एक बार घर आते हैं । जुआ खेलते कॉलेज के लड़कों के बीच कच्ची उम्र के इस लड़के के संतुलित व्यवहार ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया था। मुझे उसी समय लगा था, किसी लघुकथा के लिए कच्चा माल मिल गया है। कुछ महीनों बाद इस स्थिति पर मैंने ‘स्कूल’ लघुकथा लिखी–
“तुम्हें बताया न, गाड़ी लेट हैं,’’ स्टेशन मास्टर ने झुँझलाते हुए कहा–“छह घंटे से पहले तो आ नहीं जाएगी, अब जाओ....कल से नाक में दम कर रखा है तुमने!’’
“बाबूजी,गुस्सा न हों,’’ वह ग्रामीण औरत हाथ जोड़कर बोली–मैं बहुत परेशान हूँ, मेरे बेटे को घर से गए हुए तीन दिन हो गए हैं....उसे कल ही आ जाना था! पहली दफा घर से अकेला निकला है....’’
‘‘पर तुमने बच्चे को अकेला भेजा ही क्यों?’’ औरत की गिड़गिड़ाहट से पसीजते हुए उसने पूछ लिया।
‘‘मति मारी गई थी मेरी,’’ सह रूआँसी हो गई–‘‘बच्चे के पिता नहीं हैं, मैं दरियाँ बुनकर घर का खर्चा चलाती हूँ। पिछले कुछ दिनों से जिद कर रहा था कि वह भी कुछ काम करेगा। टोकरी–भर चने लेकर घर से निकला है....’’
‘‘घबराओ मत....आ जाएगा!’’ उसने तसल्ली दी।
‘‘बाबूजी.....वह बहुत भोला है, उसे रात में अकेले नींद भी नहीं आती है....मेरे पास ही सोता है। हे भगवान!....दो रातें उसने कैसे काटी होगी? इतनी ठंड में उसके पास ऊनी कपड़े भी तो नहीं हैं....’’ वह सिसकने लगी।
स्टेशन मास्टर अपने काम में लग गया था। वह बेचैनी से प्लेटफार्म पर टहलने लगी। उस गाँव के छोटे से स्टेशन पर चारों ओर अंधकार छाया हुआ था। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि भविष्य में वह अपने बेटे को कभी भी अपने से दूर नहीं होने देगी।
आखिर पैसेंजर ट्रेन शोर मचाती हुई उस सुनसान स्टेशन पर आ खड़ी हुई। वह साँस रोके,आँखें फाड़े डिब्बों की ओर ताक रही थी।
एक आकृति दौड़ती हुई उसके नज़दीक आई। नज़दीक से उसने देखा–तनी हुई गर्दन....बड़ी–बड़ी आत्मविश्वास भरी आँखें....कसे हुए जबड़े....होंठों पर बारीक मुस्कान....
‘‘माँ,तुम्हें इतनी रात गए यहाँ नहीं आना था।’’ अपने बेटे को गंभीर,चिंताभरी आवाज़ उसके कानों में पड़ी।
वह हैरान रह गई। उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था–इन तीन दिनों में उसका बेटा इतना बड़ा कैसे हो गया?
यदि इस लघुकथा की मूल घटना से तुलना करें तो पता चलता है कि रचना–प्रक्रिया के दौरान इसमें घटना–स्थल, क्रम, पात्र आदि बिल्कुल बदल गए हैं। ऐसा लघुकथा के लिए अनिवार्य आकारगत लघुता एवं समापन बिन्दु को ध्यान में रखते हुए अधिक प्रभावी प्रस्तुति के लिए किया गया है ।
अपनी बात को रचना-प्रक्रिया पर केन्द्रित कर लघुकथा-प्रेमियों के कुछ प्रश्नों का उत्तर देने का विनम्र प्रयास किया है ।


……………………………………………………………..

ख़लील जिब्रान को हिन्दी में पढ़ने का सुख

: प्रदीप मोघे

लघुकथा के क्षेत्र में लम्बे समय से सक्रिय हिन्दी के सुपरिचित लेखक सुकेश साहनी द्वारा संकलित एवं अनूदित ‘खलील जिब्रान की लघुकथाएँ’ नामक पुस्तक पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। लेबनान के महाकवि एवं महान दार्शनिक खलील जिब्रान (1883–1931) के साहित्य–संसार को मुख्य रूप से दो प्रकारों में रखा जा सकता है, एक : जीवन–विषयक गम्भीर चिन्तनपरक लेखन, दो : गद्यकाव्य, उपन्यास, रूपककथाएँ आदि।मानव एवं पशु–पक्षियों के उदाहरण लेकर मनुष्य जीवन का कोई तत्त्व स्पष्ट करने या कहने के लिए रूपककथा, प्रतीककथा अथवा नीतिकथा का माध्यम हमारे भारतीय पाठकों व लेखकों के लिए नया नहीं है। पंचतन्त्र, हितोपदेश इत्यादि लघुकथा–संग्रहों से भारतीय पाठक भलीभाँति परिचित हैं। खलील जिब्रान ने भी इस माध्यम को लेकर अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। समस्त संसार के सुधी पाठक उनकी इन अप्रतिम रचनाओं के दीवाने है। खलील जिब्रान की अधिकतर लघुकथाएँ ‘दि मैडमैन’, ‘दि फॉरनर’, ‘दि वांडर’ एवं ‘सन एण्ड फोम’ इन चार संग्रहों में समाहित हैं। इन सभी पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में समय–समय पर अनुवाद होता रहा है। मराठी में काका कालेलकर, वि.स.खंडेकर, रं.ग. जोशी, श्रीपाद जोशी आदि। उर्दू में बशीर, गुजराती में शिवम सुन्दरम और हिन्दी में किशोरी रमण टंडन और हरिकृष्ण प्रेमी आदि। इन सभी लेखकों ने अपनी सोच एवं उद्देश्य को लेकर यह अनुवाद कार्य किया है। हिन्दी भाषा में जिब्रान की लघुकथाओं के जितने भी अनुवाद हुए हैं, उनमें अपवाद को छोड़कर कोई भी अनुवादक/रूपान्तरकार इन अर्थपूर्ण लघुकथाओं के साथ पूर्ण न्याय नहीं कर सका है। इस पृष्ठभूमि में सुकेश साहनी द्वारा किया गया अनुवाद अधिक सरस और पठनीय है। किसी भी अक्षर साहित्य का हूबहू अनुवाद असम्भव होता है। फिर भी ऐसी कालजयी रचनाओं की आत्मा को पहचानकर उसके शिल्प–सौन्दर्य को अनुवाद की भाषा में प्रस्तुत करना एक समर्थ लेखक के लिए एक अग्निपरीक्षा होती है। जिब्रान की लघुकथाओं का हिन्दी भाषा में सटीक एवं सरस अनुवाद कर सुकेश साहनी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिब्रान की मूलत : अंग्रेजी में लिखी लघुकथाओं का अनुवाद उनके समक्ष ही उनकी मातृभाषा अरबी में हो चुका था। अरबी अनुवाद से अनुवादकों ने उर्दू में बेहतरीन तजु‍र्मान किए हैं। संस्कृत के विशेष नामों की तरह ही अरबी के विशेषनामों का शुद्ध रूप अंग्रेजी भाषा के माध्यम से हमेशा ठीक से समझा जा सकता है, कहना कठिन हैं। कई लघुकथाओं में जिब्रान द्वारा प्रयुक्त संज्ञाएँ बड़ी अर्थपूर्ण हैं। सुकेश साहनी ने अपने इस अनुवाद में इन संज्ञाओं के अभिप्रेत अर्थ को बखूबी समझा है और यही इस पुस्तक की विशेषता है।पुस्तक की भूमिका में सुकेश साहनी ने जिब्रान की लघुकथाओं को छह वर्गों में विभाजित किया है। वस्तुत : जिब्रान की हर कथा आपसे रूबरू वार्तालाप करती है। ऐसी दशा में इस तरह का वर्गीकरण केवल माँग की दृष्टि से ठीक हो सकता है परन्तु यह पाठक की सोच–क्षमता पर अकारण ही प्रश्नचिहृ लगाता है। जिब्रान की इन लघुकथाओं का मूल स्वर बनाए रखने के लिए अनुवादक ने शीर्षकों में स्वविवेक से कुछ परिवर्तन किए जाने की बात कही है। इस प्रकार के परिवर्तन में एक जोखिम भी रहता है। चूँकि जिब्रान की कथाओं के शीर्षकों में ही कथा के मूड का पता चलता है, अत : शीर्षक बदलते समय कथा की आत्मा खंडित न हो, यह सावधानी बरतना आवश्यक हो जाता है। एक–दो अपवादों को छोड़कर सुकेश के दिए नए शीर्षक कथा के साथ न्याय करते हैं। सुकेश साहनी का यह साहस उनके ख़्लील जिब्रान की लघुकथाओं के साथ तन्मयता से एकरूप होने का परिचायक हैं।
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

समकालीन जीवन–स्थितियों के अनुभूति–स्पंदित क्षणों की तलाश

–प्रेम शशांक

पुस्तक : समकालीन भारतीय लघुकथाएँ
सम्पादक : सुकेश साहनी
प्रकाशक : मेधा बुक्स, एक्स–11,
नवीन शाहदरा,दिल्ली –110032
मूल्य : 200/–

हकीकत तो यही है कि लघुकथा अभी ‘ग्रोइंग प्रासेस’ में है और ऐसी स्थिति में प्रतिनिधिक रचनात्मकता को अलगाने का काम और भी मुश्किल हो जाता है। लघुकथा लेखन के लिए अलग एप्रोच की जरूरत है विषयक लेख में प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव लिखते हैं–ग़जल या दोहे की तरह जब तक इस विधा में बारीक–ख्याली और ‘देखन में छोटे लगे’ वाली भाषा पर गम्भीरता से काम नहीं होता तब तक यह हाशियों पर बना दिए गए फूल–पत्तों की हैसियत से ऊपर नहीं उठ पाएगी। अपने लेख में राजेन्द्र यादव इस विधा की दशा और दिशा पर बहुत ही सुचिंतित और सटीक ढंग से संकेत करते हैं। आसान कथा रूप समझ कर इस विधा की ओर आकृष्ट होने वाले लेखकों को लेकर सम्पादकीय टिप्पणी में भी चिंता व्यक्त की गई है। आज जब अकेले हिंदी में सैकड़ों लघुकथा लेखक सक्रिय हैं एवं उनकी रचनाएँ विभिन्न संग्रहों/कोशों में सम्मिलित की जा रही हैं ऐसे में ‘समकालीन भारतीय लघुकथाएँ’ में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के पचास चुने हुए लेखकों की प्रस्तुति का कार्य चुनौतीपूर्ण और जोखिम से भरा था, जिसे लघुकथा के जाने माने हस्ताक्षर सुकेश साहनी ने गम्भीरता से संपादित किया है।
अवधेश कुमार की चार लघुकथाओं से गुजरता हूँ। ‘नोट’ को छोड़ दें तो शेष तीन लघुकथाएँ प्रभावित नहीं करतीं। प्रारम्भिक निराशा के साथ मैं सुकेश साहनी की ‘अपनी बात’ पर लौटता हूँ, जिसमें वह लघुकथाओं की कसौटी पर बात करते हैं। नि:संदेह लघुकथा ऐसी विधा है जिसकी सफलता इतने बारीक बिंदुओं से गुजरती है कि एकबारगी रचनाकार घबरा ही जाए लेकिन इसके कारण भी वह अच्छी तरह जानते हैं और इसके संकेत उनकी संपादकीय टिप्पणी में देखे जा सकते हैं। इस विधा की कसौटी की जटिलताएं सृजनात्मक सहजता में ही महसूस की जा सकती हैं और श्री अवधेश कुमार की लघुकथाएँ इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती।
इसके बाद कथाकार असगर वज़ाहत की चारों लघुकथाएँ अपने कथ्य और दृष्टि की गहराई के कारण उल्लेखनीय तो हैं ही, साथ ही वह जिस गम्भीरता से इस विधा को लेते हैं और सही ढंग से समझते हैं, वह बहुत से लघुकथा लेखकों के लिए विरल और स्पर्धा की चीज हो सकती है। असगर वज़ाहत लघुकथा के रूढ़ और प्रचलित ढ़ांचे को तोड़ते हैं। कथ्य के नएपन और ट्रीटमेंट में भी इस विधा की नई राहों की ओर संकेत करते हैं। आधुनिक जीवन और उससे उपजी या भविष्य में पैदा हो सकने वाली विसंगतियाँ उनकी चिंता का केन्द्र हैं। अपने लेख में राजेन्द्र यादव ने लघुकथा लेखन की जिन कमियों की ओर संकेत किया है, वह उनसे उबरे हुए हैं। हिंदी कहानी में उनके सामानधर्मा साथी उदय प्रकाश भी यहाँ उनसे पिछड़े हुए हैं। लघुकथा लेखन के जिस सपाटपन को लेकर अकसर टिप्पणी की जाती हैं, वह उससे घिर गए हैं, उनकी चारों लघुकथाएँ इस कमजोरी की साक्ष्य है।
इस विधा के विकास में सपाटबयानी एक बड़े अवरोध के रूप में दिखाई देती हैं। सपाटबयानी कथ्य के स्तर पर ही नहीं शिल्प के स्तर पर भी महसूस की जाती हैं । लघुकथाओं में संवाद आयोजन के द्वारा कथ्य संप्रेषण की विधि काफी रूढ़ और उकताने वाली है क्योंकि सीधे संवादों के माध्यम से कथ्य व दृष्टि परोसने का ढंग उतना ही रूढ़ है जितना कि लघुकथा का इतिहास । इधर खलील जि़ब्रान की सुकेश साहनी द्वारा अनूदित लघुकथा ‘प्लूटोक्रेट’ पढ़ी । मैंने देखा कि संग्रह में शामिल असगर वज़ाहत की लघुकथा ‘सुख’ और खलील जिब्रान की लघुकथा में सीधे–सीधे तो कोई समानता नहीं है किन्तु दृष्टि वही हैं। दृष्टि संप्रेषित करने के ढंग में दोनों रचनाकारों के समय की जटिलताएं और अन्र्तध्वनियाँ साफ महसूस की जा सकती हैं।
यही त्वरा इस संग्रह में शामिल रघुनंदन त्रिवेदी (स्मृतियों में पिता) रवींद्र वर्मा (रोटी कपड़ा और मकान) राजेन्द्र यादव (चारों लघुकथाएँ), मालचन्द्र तिवाड़ी (चारों लघुकथाएँ) की रचनाओं में देखी जा सकती है। इन संदर्भित लघुकथाओं में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रचनाकार इनके शिल्प को लेकर सजग हैं, बनी बनाई परिपाटियों पर न चलकर कुछ नए ढंग से कहने की जद्दोजहद दिखाई देती है। खासकर राजेन्द्र यादव अपनी चारों लघुकथाओं में जो विषय चुनते हैं, उनमें निजता महसूस की जा सकती है।
इसके अतिरिक्त कुछ और लघुकथाएँ प्रभावित करती हैं–कैरम (प्रेम कुमार मणि), फुटबाल (बलराम अग्रवाल), बेजान चिट्ठी (मोहन लाल पटेल), बलात्कार (यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’), दुआ (रमेश बतरा), धर्म निरपेक्ष, ऊँचाई (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’), गंदी बातें (हरदर्शन सहगल), विधान सभा का मोड़ (हीरालाल नागर), प्रत्याक्रमण (हसन जमाल),तानाशाह और चिडि़याँ (भगीरथ), रोटी का टुकड़ा (भूपिन्दर सिंह), संतू (श्याम सुंदर अग्रवाल), हद (श्याम सुंदर ‘दीप्ति’)। इन लघुकथाओं में कहीं विषय का नयापन आकर्षित करता है तो कहीं कहने का ढंग आश्वस्त करता है। पिछले दिनों कथादेश के किसी अंक में समीक्ष्य संग्रह के सम्पादक सुकेश साहनी की लघुकथा ‘खेल’ छपी थी। विषय की ताजगी और शिल्प में अद्भुत सामंजस्य होन के कारण यह एक बेहतरीन लघुकथा थी।
ऐसा संकेत तो इस संग्रह में कहीं नहीं मिलता कि इसमें चयनित लघुकथाओं का रचनाकाल कब का है। सम्पादक ने अपनी बात में इस ओर संकेत किया है कि लघुकथा की मूल धारा में लम्बे समय से सक्रिय अनेक कथाकारों का लेखन सीमित हो गया है। संग्रह में समसामयिक विषयों पर आधारित लघुकथाओं के अभाव के पीछे यह भी एक प्रमुख कारण हो सकता है। लेकिन इस तरह के प्रयास जो सामूहिक प्रतिनिधित्व को प्रस्तुत करते हैं किसी भी विधा के विकास में रचनात्मक आश्वस्तिकारक ,ऐतिहासिक भूमिका निभाते हैं। लघुकथा को इस तरह के प्रयासों की सख्त जरूरत है। इस दृष्टि से सुकेश साहनी के इस कार्य की प्रशंसा की जानी चाहिए। राजेन्द्र यादव ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि आज की लघुकथाओं में सामाजिक–राजनैतिक सरोकार और बेचैनी तो बहुत है, मगर प्राय: समकालीन जीवन–स्थितियों के अनुभूति–स्पंदित क्षणों से बचने की प्रवृत्ति है। लघुकथा लेखकों को यादव जी की इस टिप्पणी को गम्भीरता से लेना चाहिए।
………………………………………



मेरी पसंद की लघुकथा

मेरी पसंद की लघुकथा- “खेल(रेनड्रॉप के चैटरूम से)”
सुभाष नीरव

हिंदी के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं यथा-पंजाबी, उर्दू, मराठी, गुजराती, बंगला, तेलुगू तथा विश्व की अनेक भाषाओं में लिखी गई नई-पुरानी कई लघुकथाएँ मुझे पसंद हैं। लेकिन, इधर समकालीन हिंदी लघुकथाओं में सुकेश साहनी की लघुकथा “खेल(रेनड्रॉप के चैटरूम से)” जो हिंदी की मासिक कथा पत्रिका “कथादेश” के विशेषांक “ 10 वर्ष- एक चयन” में प्रकाशित हुई थी, मेरी मनपसंद लघुकथा है।
दरअसल, लघुकथा को लेकर मेरी जो अपेक्षाएँ रही हैं, खासकर समकालीन लघुकथा को लेकर, “खेल” लघुकथा उन सभी अपेक्षाओं को पूरा करती प्रतीत होती है। यह लघुकथा वार्तालाप शैली में लिखी गई है जो कि नई शैली नहीं है। इस शैली में पहले भी लघुकथाएँ लिखी जाती रही हैं और अभी भी लिखी जा रही हैं। लेकिन, नया है इसका कंटेंट्स, इसकी प्रस्तुति, इसकी भाषा। बदलते समय के यथार्थ को तो यह लघुकथा कम समय और कम शब्दों में व्यंजनात्मक ढंग से रखती ही है, यह बदले हुए समय द्वारा आधुनिक समय में मुहैया कराये गए नये संचार माध्यमों और उनमें प्रयुक्त भाषा का बखूबी इस्तेमाल भी करती है। आज नेट की दुनिया ने आपसी वार्तालाप या बातचीत की जो नई सुविधा ‘चैट’ के माध्यम से हमें उपलब्ध कराई है, लेखक उसका बेहद कुशलता से प्रयोग इस लघुकथा में करता है।
लघुकथा पर प्राय: यह आरोप लगाया जाता रहा है कि इस में नये विषय, नई बात दिखाई नहीं देती, कि लघुकथा वर्तमान भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में जटिल विषयों को अभिव्यक्ति देने में असमर्थ है, कि बार-बार इसमें वही घिसे-पिटे विषय दोहराये जा रहे हैं और उन्हें परम्परागत भाषा-शैली में पाठकों के सम्मुख परोसा जा रहा है, कि लघुकथा अपने एक सीमित घेरे से बाहर नहीं निकल पा रही है। और यह भी कि जटिल और गंभीर विषयों को लघुकथा में अभिव्यक्ति देने में आड़े आता है– इसका आकार। लेकिन, मैं ऐसा नहीं मानता। वर्तमान समय में लघुकथा अपने लम्बे सफ़र के बाद आज जहाँ खड़ी है, वहाँ ,पहुँचकर इसने इन सभी चुनौतियों को स्वीकारा है और नये समय की नयी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने में इसने अपने आप को सक्षम भी किया है। यह हमारी समयगत सच्चाइयों से जुड़े गंभीर से गंभीर, जटिल से जटिल विषय पर अपनी शक्ति का परिचय दे रही है। “खेल” लघुकथा का उदाहरण मेरी इस बात की पुष्टि के लिए काफी है।
इस लघुकथा में ‘चैट’ के विकसित हुए नए संवाद-माध्यम से एक लड़की और लड़के के मध्य हुई छोटी-सी वार्तालाप को आधार बनाकर अपने समय के सच को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया गया है। इसमें दिल्ली की (निरंकुश) सत्ता से लेकर गुजरात के दंगों तक की बात जिस मारक फैंटेसी में बातचीत के माध्यम से कही गई है, वह इस लघुकथा की शक्ति को और बढ़ा देती है। लड़की गुजरात से है और लड़का दिल्ली से। लड़की का परिचय पाने के बाद जब लड़का लड़की से कहता है–‘आय वुड लाइक टू प्ले विद यू’ तो प्रत्युत्तर में लड़की ठहाका लगाते हुए उत्तर देती है–‘देहली इज आलरेडी प्लेइंग विद गुजरात।’
यहाँ लेखक का रचना-कौशल भी देखते बनता है और यह बात भी स्पष्ट होती है कि लेखक के अपने समय और समाज के प्रति क्या सरोकार हैं और वह अपने लेखन, खासकर लघुकथा लेखन के जरिये उन सरोकारों को कैसे रेखांकित करता(करना चाहता) है। इस लघुकथा में पुरुष का लोलुप और भोगवादी चरित्र भी बखूबी उभर कर सामने आता है जब वह लड़की से कहता है– ‘जस्ट आय वांट टू सी यू न्यूड’ और अंत में जब वह कहता है ‘यू आर बोरिंग, स्पॉयलिंग माय टाइम...एनअदर गर्ल विद वेब कैमरा इज आन लाइन फार मी... बाइ! बाई फार एवर !!’
एक श्रेष्ठ लघुकथा में जिन आवश्यक तत्वों की दरकार आज की जाती है–मसलन वह आकार में बड़ी न हो, कम पात्र हों, समय के एक ही कालखंड को समाहित किए हो, अनावश्यक डिटेल्स न हों, शीर्षक रचना को पुष्ट और पुख्ता करता हो, उसकी गति अपने प्रारंभ-बिन्दु से अन्तिम बिन्दु(चरम बिन्दु) की ओर हो, विषय को लेकर किसी प्रकार का उलझाव न हों, और अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर अपनी मारक और असरदार शक्ति का प्रदर्शन करे, वे सभी तत्व मुझे इस लघुकथा में क्रमश: दिखाई देते हैं।

“खेल” में वार्तालाप-शैली होने के कारण इसके संवादों को बेहद चुस्त-दुरुस्त, सटीक और समयानुरूप रखा गया है और उन्हें चुटीला और व्यंजनात्मक बनाने की भरपूर कोशिश की गई है। ये संवाद ‘टू दि प्वाइंट’ बात कहते हैं और अनावश्यक डिटेल्स से पूरी तरह बचते हैं। वैसे भी चैट की आधुनिक संवाद-प्रविधि में अनावश्यक शब्द नहीं होते हैं और शब्दों में मितव्यतता बरती जाती है। सुकेश साहनी ने इस आधुनिक संवाद विधि का अपनी इस लघुकथा में बेहद सफल प्रयोग किया है।
और अंत में इसके शीर्षक पर भी बात करना प्रासंगिक और बेहद आवश्यक है। लघुकथाओं में अधिकांशत: शीर्षक अत्यंत चलताऊ ढंग से रख दिए जाते हैं जो एक अच्छी लघुकथा को भी प्रभावहीन कर देते हैं। इस लघुकथा में दर्शाया गया खेल सत्ता-नगरी में सैक्यूलरवाद का मुखौटा लगाये लड़के का साम्प्रदायिक दंगे की शिकार हुई गुजरात की लड़की से चैट के माध्यम से खेले जाने वाले खेल तक ही सीमित नहीं है, यह “खेल” शीर्षक उन सभी खेले जा रहे खेलों को भी ध्वनित करता है जो मानवता के विरुद्ध आज खुलेआम खेले जा रहे हैं। उन छद्म संवेदनाओं के खेल की ओर भी संकेत करता है जिसे हम नित्य अपने आसपास की दुनिया में देख-सह रहे हैं।

248, टाईप-3, सेक्टर-3
सादिक़ नगर, नई दिल्ली-110049
दूरभाष : 09810534373
ई-मेल : subhneerav@gmail.com
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
मेरी पसन्द की लघुकथा

खेल
सुकेश साहनी

(रेनड्रॉप के चैट रूम से)

मायसेल्फ : हैलो?
रेनड्रॉप : हाय!
मायसेल्फ : ए एस एल प्लीज?
रेनड्रॉप : 22, फीमेल फ़्राम गुजरात एण्ड यू?
मायसेल्फ : मेल फ़्राम देहली।
रेनड्रॉप : ओके....
मायसेल्फ : आय वुड लाइक टू प्ले विद यू।
रेनड्रॉप : लाफ आन लाउड (ठहाका!)
मायसेल्फ : क्या हुआ?
रेनड्रॉप :देहली इज़ आलरेडी प्लेइंग विथ गुजरात
मायसेल्फ :गुड सेंस आफ़ ह्यूमर !
रेनड्रॉप : नो, आय एम सीरियस।
मायसेल्फ : टेक इट ईजी! गुजरात अब बिल्कुल ‘फिट है। कम आन, यू विल एन्जॉय माय कम्पनी।
रेनड्रॉप : ओके......वाट यू हैव इन योअर माइंड?
मायसेल्फ : तुम्हारे पास वेब कैमरा है?
रेनड्रॉप : हां और तुम्हारे पास?
मायसेल्फ : चैटिंग फ़्राम अ रिजॉ़र्ट, नो कैम (रा) नो पिक (चर) हियर।
रेनड्रॉप : ओके....
मायसेल्फ : जस्ट वांट टू सी यू न्यूड।
रेनड्रॉप : ओके ..बट आय अलर्ट यू–यू आर नाट गोइंग टू एन्जॉय माय न्यूडिटी।
मायसेल्फ : नो, आय कैन बेट...यू आर हॉट।
रेनड्रॉप : माय कैमरा इज आन नाउ, आर यू वाचिंग मी?
मायसेल्फ : यस, बट यू आर नाट न्यूड........यू आर स्टिल वेअरिंग समथिंग।
रेनड्रॉप : इस बुरे मौसम में दिल्ली से गुजरात को साफ–साफ देखना थोड़ा मुश्किल है।
मायसेल्फ : फिर वही मजाक!
रेनड्रॉप : व्हयू माय क्लोज अप.....आय एम नाट वेअरिंग एनीथिंग।
मायसेल्फ : तुम्हारे जिस्म पर ये निशान?
रेनड्रॉप : दंगाइयों ने हमारे साथ सामूहिक बलात्कार किया, हमारे जिस्मों को बेरहमी से रौंदा गया, ये उन्हीं जख्मों के निशान हैं।
मायसेल्फ : ओह!.....तब तो तुमने उन्हें बहुत करीब से देखा है, वे कौन थे?
रेनड्रॉप : पहचानना मुश्किल था, उन्होंने एक ही सांचे में ढले मुखौटे पहन रखे थे।
मायसेल्फ : टेल मी एवरीथिंग अबॉउट दिस, हम इस ‘स्टोरी को अपनी पार्टी की वेब साइट के मुख पृष्ठ पर देंगे।
रेनड्रॉप : वाट इज द नेम आफ योअर वेब साइट?
मायसेल्फ : सेकुलर 2002 डॉट कॉम।
रेनड्रॉप : ओके......आय एम रेडि फॉर नेट मीटिंग।
मायसेल्फ : लेकिन आगे बढ़ने से पहले–जस्ट फॉर फॉरमेलिटि–हमारा यह जानना जरूरी है कि तुम किस सम्प्रदाय से हो।
रेनड्रॉप : सॉरी, डियर! रेनड्रॉप (वर्षा की बूँद) इज फॉर आल। हमारी कोई बिरादरी नहीं होती।
मायसेल्फ : यू आर बोरिंग, स्पॉइलिंग माय टाइम.......एनअदर गर्ल विद वेब कैमरा इज आन लाइन फार मी। बाइ! बाइ फॉर एवर!!
>>>>>>>>>>>>