हम खुशी से उछल पड़े। टास हमारे पक्ष में गया था। अब उन दो रास्तों में से किसी एक को हम चुन सकते थे।
पहला रास्ता काफी बीह्ड़ था, उस पर चलते हुए हमें आग उगलते सूरज का सामना करना पड़ता जबकि दूसरा रास्ता समतल,साफ सुथरा था, उसके दोनों ओर घने पेड़ों की छाया थी। उस पर चलते हुए सूरज की ओर हमारी पीठ रहनी थी।
हमने दूसरा रास्ता चुना।
हम बेफिक्र थे। टास ने हमारा काम आसान कर दिया था। हमने पलक झपकते ही निधार्रित दूरी तय कर ली थी। लेकिन लक्ष्य पर पहुंचते ही हमें शाक-सा लगा,सारी खुशी काफूर हो गयी। प्रतिद्वद्वी टीम उस दुर्गम रास्ते से हमसे पहले वहां पहुंचर जशन मना रही थी। वे पसीने से तर बतर थे। श्रम की आंच से उनके चेहरे दमक रहे थे।
हमारे चेहरे बुझे हुए थे। हमारे पास अपनी लम्बी होती परछाइयों के सिवा कुछ भी न था।
मनोविज्ञान
1514-वह स्त्री है
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*[आपने स्त्री जीवन के संघर्ष को पीड़ा को समझा अपने शब्दों से उसके मौन स्वर
को मुखरित किया। साधुवाद आदरणीय। उसी कविता की अंतिम पंक्ति से जोड़कर मैंने-‘ ...
2 days ago
1 comment:
प्रेरक रचना है।
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