Thursday, October 25, 2007

मैग्मा

आंखों पर तेज रोशनी पड़ती है, एक पल के लिए कुछ दिखाई नहीं देता। प्रकाश के स्रोत की ओर नजरें गड़ाकर देखता हूं। धीरे–धीेरे सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है–एक बड़ा–सा गोला है, जो अपने–आप में किसी लट्टू की तरह घूमता हुआ चक्कर लगा रहा है। इस गोले का केंद्रीय भाग ठोस न होकर पिघला हुआ है, पिघले भाग के तापमान का अनुमान इसी से हो जाता है कि यह भाग खौल रहा है, अंगारे–सा दहक रहा है। इसी भाग से प्रकाश फूट रहा है।
एकाएक उस गोले से नंगा आदमी निकलकर मेरे सामने खड़ा हो जाता है। गोले से फूटते प्रकाश में उसका शरीर जगमग कर रहा है। ऐसा लगता है, मानव उसका शरीर क्वाट्र्ज का है और प्रकाश उसके भीतर से फूट रहा है। उसके सीने वाले भाग में उस गोले जैसा खौलता द्रव पदार्थ है। मुझे लगता है कि मैंने इस तरह का दृश्य पहले भी कहीं देखा है। दिमाग पर जोर डालता हूँ तो याद आता है कि बरसों पहले जियोलॉजिकल स्टडी टुअर के दौरान इलेक्ट्रिक फरनेस में देखने का अवसर मिला था, जिसमें उच्च तापमान में लोहे को पिघलाया जा रहा था। भट्ठी में पिघला लोहा सोने–सा दमक रहा था, लेकिन उस पिघले लोहे को अधिक देर तक नंगी आंखों से देखना संभव नहीं था। कुछ ही पलों में हम पसीने से नहा गए थे... ठीक वैसा ही दृश्य है, पर इस गोले और आदमी के भीतर के पिघले द्रव को लगातार देख पा रहा हूँ।
सामने खडे आदमी का चेहरा किसी बच्चे जैसा है। लगता है, इसे अच्छी तरह जानता हूँ.... पर उसका नाम–पता याद नहीं आता।
गोले की सतह दर्पण सी चमक रही है।
बडा–सा मैदान है। जहां तक नजर जाती है .... रेत –ही–रेत है.... पेड पौधौं का नामोनिशान तक नहीं है .... कोई जीव जन्तु भी दिखाई नहीं देता.....रेत पर नंगे आदमी के पैरों की छाप स्पष्ट दिखाई दे रही है। जहां–जहां उसके पैर पडते हैं, नन्हीं घास उग आती है। वह एक जगह जमीन में गड्ढा खोदता है, वहां से फव्वारे के रूप में पानी फेट पड़ता है। जगह–जगह नन्हें पौधे दिखाई देने लगते हैं। वह पौधे को छूता है.... पौधा पेड़ में तब्दील हो जाता है। पेड़ को छूता है.... पेड़ फलों से लद जाता है। वह किसी बैले डांसर की तरह इधर से उधर थिरक रहा है। देखते ही देखते वो रेगिस्तानी भाग भरे–पूरे जंगल में बदल जाता है। उस आदमी के सीने का खौलता द्रव वहां के सभी प्राणियों में दिखाई देने लगता है, ठीक किसी सेल (कोशिका) के न्यूकलिअस की तरह।
सोचता हूँ, इस नंगे आदमी और उसके सीने की आग को कैमरे में कैद कर लेना चाहिए। पूरी दुनिया में धूम मच जाएगी, एक–एक फोटोग्राफ लाखों का बिकेगा।
कैमरे को आंख से लगाकर लेंस को फोकस करता हूँ .....हरा–भरा जंगल तो दिखाई देता है, पर नंगा आदमी गायब हो जाता है। फिर कोशिश करता हूँ .... इस बार कोई दूसरा दिखाई देता है, उसने ठीक मेरे जैसा सूट पहन रखा है। मुझे निराशा घेर लेती है, क्योंकि उसके सीने में वो आग दिखाई नहीं देती। मै कैमरा एक ओर रख देता हूँ ।
उस आदमी के सीने की आग के प्रति मन में विचित्र–सी प्यास जाग जाती है। सोचता हूँ ––वह आदमी नंगा था, जंगल के दूसरे जीव जंतु भी नंगे थे। क्यों न अपने कपड़े उतार कर देखूँ....शायद मेरे भीतर भी वैसी ही आग हो।
मन में आशा बंधती है।
मै एक–एक कर अपने कपडे़ उतारने लगता हूँ ,पर कपड़े हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे है,ं प्याज के छिलकों की तरह एक के बाद एक निकलते आ रहे हैं। जल्दी ही थक जाता हूँ। सोचता हूँ कि मुझे कपड़े उतारने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, बल्कि उस नंगे आदमी को ही खोजना चाहिए।
जंगल में भटक रहा हूँ .... जहां–जहां मेरे पैर पड़ते हैं , वहां–वहां की घास जलकर राख हो जाती है। जिस चीज को छूता हूँ मिट्टी हो जाती है। पानी पीने के लिए जिस जल–स्रोत की ओर हाथ बढा़ता हूँ वह सूख जाता है। घबराकर मै रोने लगता हूँ ।
कंधे पर स्नेहिल स्पर्श से मैं चौक पड़ता हूँ। सिर उठाकर देखता हूँ––मुझसे थोडी़ दूरी पर वह खड़ी है। उसके बाल चांदी –से चमक रहे हैं, चेहरे पर वात्सल्य है। उसके सीने में भी खौलता हुआ द्रव है।
‘‘तुम रो क्यों रहे थे?’’ वह पूछती है।
‘‘वो मैं...’’ मैं संभलकर जवाब देता हूँ ‘‘शायद मैंने कोई बुरा सपना देखा था।’’
वह कुछ नहीं कहती, एकटक मेरी ओर देखती है। उसके चेहरे पर गहरी उदासी है, बहुत देर तक हममें कोई बात नहीं होती।
‘‘आओ, मैं तुम्हारे सीने में फिर से खौलते द्रव (मैग्मा1) की आग भर दूं। ’’ वह अपनी बांहें मेरी ओर फैला देती है।
मैं डरकर पीछे की ओर खिसकता हूँ।
यहीं जाग जाता हूँ। कमरे में नाइट बल्ब की धुंधली रोशनी है। दिल की धड़कन अभी तक असामान्य है। सीने में अजीब–सी सुलगन है। कमरा काफी गर्म है ।
सपने में अपने रोने की बात याद कर राहत–सी महसूस करता हूँ । कहते हैं––सपने में रोना शुभ होता है। उठकर एयरकंडीशनर की गति बढ़ा देता हूँ कमरा बिल्कुल पहले जैसा हो जाता है .... एकदम ‘ठंडा’।
................................................................................................

मैग्मा 1 पृथ्वी के भीतर सदैव पिघली अवस्था में रहने वाला द्रव पदार्थ बहुत–सी प्रक्रियाओं के लिए उत्तरदायी । यहीं द्रव जब धरती की सतह पर निकल आता है, तो लावा कहलाता है।

No comments: