Thursday, May 10, 2007

घर


प्रभाकर फोन पर पेरिस की किसी फैशन डिजायनर से बात कर रहा था।
वे दोनों कोठी के बाहर खूबसूरत लान की मखमली घास पर कुर्सियाँ डालकर बैठे थे। सुबह की शीतल हवा के साथ लान के बीचोंबीच चल रहा फ़व्वारा आँखों को बहुत ठंडक पहुँचा रहा था।
रामप्रसाद ने ईर्ष्याभरी निगाह प्रभाकर की संगमरमरी महलनुमा कोठी पर डाली---उसके बचपन का दोस्त आज कितना बड़ा आदमी बन गया, यहां नौकरों के लिए बनाए गए क्वार्टर भी उसके घर से कई गुना अच्छे हैं। ---सब किस्मत का खेल है! उसने ठंडी साँस ली।
तभी प्रभाकर की पत्नी आँख मलते हुए कोठी से बाहर निकली और लान की हरी-भरी घास पर नंगे पाँव टहलने लगी।
“प्रभाकर, अब मैं वापिस जाऊँगा।” फोन पर बात खत्म होते ही उसने कहा।
“इतनी जल्दी? नहीं रामप्रसाद---मैं तुम्हें अभी नहीं जाने दूँगा। आज तुमको अपना फार्म हाउस दिखाऊँगा, अरे---कोई है!” प्रभाकर वहीं से चिल्लाया, “---बहादुर!---किशन!!---एक गिलास पानी तो लाना।”
“नहीं प्रभाकर, मेरा जाना ज़रूरी है। तुम्हारी भाभी से एक दिन का कहकर आया था, पूरे तीन दिन हो गए हैं।बच्चे भी परेशान होंगे।”
“रामप्रसाद---तुम कहाँ पड़े हो फतेहपुर में---वो भी कोई जगह है रहने की! मैं तो कहता हूँ अभी समय है---घर ज़मीन बेच-बाचकर दिल्ली आ जाओ। बच्चों का कैरियर बन जाएगा।---किशन!---ओ किशन!!” वह चीखा, “कहाँ मर गए सब के सब! जल्दी पानी लाओ---गला सूख रहा है।”
रामप्रसाद ने देखा, प्रभाकर का बेटा क्यारी के पास खड़ा लाल सुर्ख गुलाबों को बड़े प्यार से देख रहा था।
“रामू---ओ रामू! जल्दी लाओ---जल्दी !” झल्लाकर उसने मेज पर पड़ी रिमोट बैल को देर तक दबाया।
रामप्रसाद ने हैरानी से मिसेज प्रभाकर की ओर देखा, वह अपने पति की चीख-पुकार से बेखबर कैक्टस के पौधों को पानी देने में व्यस्त थी। रामप्रसाद की आँखों के आगे घर,पत्नी और बच्चे घूम गए। इतना शोर करने पर तो कई गिलास पानी उसके सामने आ जाता---पत्नी तो उसके मन की बात चुटकियों में बूझ लेती है।
एकाएक रामप्रसाद की आंखों के आगे प्रभाकर का संगमरमरी महल ताश के पत्तों से बने घर की तरह भरभराकर गिर गया।

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