Sunday, March 2, 2008

समकालीन जीवन–स्थितियों के अनुभूति–स्पंदित क्षणों की तलाश

प्रेम शशांक

पुस्तक : समकालीन भारतीय लघुकथाएँ
सम्पादक : सुकेश साहनी
प्रकाशक : मेधा बुक्स, एक्स–11,
नवीन शाहदरा,दिल्ली –110032
मूल्य : 200/–

हकीकत तो यही है कि लघुकथा अभी ‘ग्रोइंग प्रासेस’ में है और ऐसी स्थिति में प्रतिनिधिक रचनात्मकता को अलगाने का काम और भी मुश्किल हो जाता है। लघुकथा लेखन के लिए अलग एप्रोच की जरूरत है विषयक लेख में प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव लिखते हैं–ग़जल या दोहे की तरह जब तक इस विधा में बारीक–ख्याली और ‘देखन में छोटे लगे’ वाली भाषा पर गम्भीरता से काम नहीं होता तब तक यह हाशियों पर बना दिए गए फूल–पत्तों की हैसियत से ऊपर नहीं उठ पाएगी। अपने लेख में राजेन्द्र यादव इस विधा की दशा और दिशा पर बहुत ही सुचिंतित और सटीक ढंग से संकेत करते हैं। आसान कथा रूप समझ कर इस विधा की ओर आकृष्ट होने वाले लेखकों को लेकर सम्पादकीय टिप्पणी में भी चिंता व्यक्त की गई है। आज जब अकेले हिंदी में सैकड़ों लघुकथा लेखक सक्रिय हैं एवं उनकी रचनाएँ विभिन्न संग्रहों/कोशों में सम्मिलित की जा रही हैं ऐसे में ‘समकालीन भारतीय लघुकथाएँ’ में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के पचास चुने हुए लेखकों की प्रस्तुति का कार्य चुनौतीपूर्ण और जोखिम से भरा था, जिसे लघुकथा के जाने माने हस्ताक्षर सुकेश साहनी ने गम्भीरता से संपादित किया है।
अवधेश कुमार की चार लघुकथाओं से गुजरता हूँ। ‘नोट’ को छोड़ दें तो शेष तीन लघुकथाएँ प्रभावित नहीं करतीं। प्रारम्भिक निराशा के साथ मैं सुकेश साहनी की ‘अपनी बात’ पर लौटता हूँ, जिसमें वह लघुकथाओं की कसौटी पर बात करते हैं। नि:संदेह लघुकथा ऐसी विधा है जिसकी सफलता इतने बारीक बिंदुओं से गुजरती है कि एकबारगी रचनाकार घबरा ही जाए लेकिन इसके कारण भी वह अच्छी तरह जानते हैं और इसके संकेत उनकी संपादकीय टिप्पणी में देखे जा सकते हैं। इस विधा की कसौटी की जटिलताएं सृजनात्मक सहजता में ही महसूस की जा सकती हैं और श्री अवधेश कुमार की लघुकथाएँ इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती।
इसके बाद कथाकार असगर वज़ाहत की चारों लघुकथाएँ अपने कथ्य और दृष्टि की गहराई के कारण उल्लेखनीय तो हैं ही, साथ ही वह जिस गम्भीरता से इस विधा को लेते हैं और सही ढंग से समझते हैं, वह बहुत से लघुकथा लेखकों के लिए विरल और स्पर्धा की चीज हो सकती है। असगर वज़ाहत लघुकथा के रूढ़ और प्रचलित ढ़ांचे को तोड़ते हैं। कथ्य के नएपन और ट्रीटमेंट में भी इस विधा की नई राहों की ओर संकेत करते हैं। आधुनिक जीवन और उससे उपजी या भविष्य में पैदा हो सकने वाली विसंगतियाँ उनकी चिंता का केन्द्र हैं। अपने लेख में राजेन्द्र यादव ने लघुकथा लेखन की जिन कमियों की ओर संकेत किया है, वह उनसे उबरे हुए हैं। हिंदी कहानी में उनके सामानधर्मा साथी उदय प्रकाश भी यहाँ उनसे पिछड़े हुए हैं। लघुकथा लेखन के जिस सपाटपन को लेकर अकसर टिप्पणी की जाती हैं, वह उससे घिर गए हैं, उनकी चारों लघुकथाएँ इस कमजोरी की साक्ष्य है।
इस विधा के विकास में सपाटबयानी एक बड़े अवरोध के रूप में दिखाई देती हैं। सपाटबयानी कथ्य के स्तर पर ही नहीं शिल्प के स्तर पर भी महसूस की जाती हैं । लघुकथाओं में संवाद आयोजन के द्वारा कथ्य संप्रेषण की विधि काफी रूढ़ और उकताने वाली है क्योंकि सीधे संवादों के माध्यम से कथ्य व दृष्टि परोसने का ढंग उतना ही रूढ़ है जितना कि लघुकथा का इतिहास । इधर खलील जि़ब्रान की सुकेश साहनी द्वारा अनूदित लघुकथा ‘प्लूटोक्रेट’ पढ़ी । मैंने देखा कि संग्रह में शामिल असगर वज़ाहत की लघुकथा ‘सुख’ और खलील जिब्रान की लघुकथा में सीधे–सीधे तो कोई समानता नहीं है किन्तु दृष्टि वही हैं। दृष्टि संप्रेषित करने के ढंग में दोनों रचनाकारों के समय की जटिलताएं और अन्र्तध्वनियाँ साफ महसूस की जा सकती हैं।
यही त्वरा इस संग्रह में शामिल रघुनंदन त्रिवेदी (स्मृतियों में पिता) रवींद्र वर्मा (रोटी कपड़ा और मकान) राजेन्द्र यादव (चारों लघुकथाएँ), मालचन्द्र तिवाड़ी (चारों लघुकथाएँ) की रचनाओं में देखी जा सकती है। इन संदर्भित लघुकथाओं में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रचनाकार इनके शिल्प को लेकर सजग हैं, बनी बनाई परिपाटियों पर न चलकर कुछ नए ढंग से कहने की जद्दोजहद दिखाई देती है। खासकर राजेन्द्र यादव अपनी चारों लघुकथाओं में जो विषय चुनते हैं, उनमें निजता महसूस की जा सकती है।
इसके अतिरिक्त कुछ और लघुकथाएँ प्रभावित करती हैं–कैरम (प्रेम कुमार मणि), फुटबाल (बलराम अग्रवाल), बेजान चिट्ठी (मोहन लाल पटेल), बलात्कार (यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’), दुआ (रमेश बतरा), धर्म निरपेक्ष, ऊँचाई (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’), गंदी बातें (हरदर्शन सहगल), विधान सभा का मोड़ (हीरालाल नागर), प्रत्याक्रमण (हसन जमाल),तानाशाह और चिडि़याँ (भगीरथ), रोटी का टुकड़ा (भूपिन्दर सिंह), संतू (श्याम सुंदर अग्रवाल), हद (श्याम सुंदर ‘दीप्ति’)। इन लघुकथाओं में कहीं विषय का नयापन आकर्षित करता है तो कहीं कहने का ढंग आश्वस्त करता है। पिछले दिनों कथादेश के किसी अंक में समीक्ष्य संग्रह के सम्पादक सुकेश साहनी की लघुकथा ‘खेल’ छपी थी। विषय की ताजगी और शिल्प में अद्भुत सामंजस्य होन के कारण यह एक बेहतरीन लघुकथा थी।
ऐसा संकेत तो इस संग्रह में कहीं नहीं मिलता कि इसमें चयनित लघुकथाओं का रचनाकाल कब का है। सम्पादक ने अपनी बात में इस ओर संकेत किया है कि लघुकथा की मूल धारा में लम्बे समय से सक्रिय अनेक कथाकारों का लेखन सीमित हो गया है। संग्रह में समसामयिक विषयों पर आधारित लघुकथाओं के अभाव के पीछे यह भी एक प्रमुख कारण हो सकता है। लेकिन इस तरह के प्रयास जो सामूहिक प्रतिनिधित्व को प्रस्तुत करते हैं किसी भी विधा के विकास में रचनात्मक आश्वस्तिकारक ,ऐतिहासिक भूमिका निभाते हैं। लघुकथा को इस तरह के प्रयासों की सख्त जरूरत है। इस दृष्टि से सुकेश साहनी के इस कार्य की प्रशंसा की जानी चाहिए। राजेन्द्र यादव ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि आज की लघुकथाओं में सामाजिक–राजनैतिक सरोकार और बेचैनी तो बहुत है, मगर प्राय: समकालीन जीवन–स्थितियों के अनुभूति–स्पंदित क्षणों से बचने की प्रवृत्ति है। लघुकथा लेखकों को यादव जी की इस टिप्पणी को गम्भीरता से लेना चाहिए।
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